Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1143

1875 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- यजत आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣡ वो꣢ मि꣣त्रा꣡य꣢ गायत꣣ व꣡रु꣢णाय वि꣣पा꣢ गि꣣रा꣢ । म꣡हि꣢क्षत्रावृ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥११४३॥

प्र꣢ । वः꣣ । मित्रा꣡य꣢ । मि꣣ । त्रा꣡य꣢꣯ । गा꣣यत । व꣡रु꣢꣯णाय । वि꣣पा꣢ । गि꣣रा꣢ । म꣡हि꣢꣯क्षत्रौ । म꣡हि꣢꣯ । क्ष꣣त्रौ । ऋत꣢म् । बृ꣣ह꣢त् ॥११४३॥

Mantra without Swara
प्र वो मित्राय गायत वरुणाय विपा गिरा । महिक्षत्रावृतं बृहत् ॥

प्र । वः । मित्राय । मि । त्राय । गायत । वरुणाय । विपा । गिरा । महिक्षत्रौ । महि । क्षत्रौ । ऋतम् । बृहत् ॥११४३॥

Samveda - Mantra Number : 1143
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! (वः) तुम (विपा) बुद्धिपूर्ण (गिरा) वाणी से (मित्राय) विपत्ति से त्राण करनेवाले परमात्मा के लिए और (वरुणाय) वरण करने योग्य जीवात्मा के लिए (गायत) गाओ, अर्थात् उनका गुणगान करो। हे (महिक्षत्रौ) महान् बलवाले परमात्मा और जीवात्मा ! तुम दोनों का (ऋतम्) सत्य ज्ञान और सत्य कर्म (बृहत्) महान् है ॥१॥
Essence
जीवात्मा परमात्मा के साथ मित्रता स्थापित करके महान् सत्यज्ञानों को पा सकता है और महान् सत्यकर्मों को कर सकता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में मित्र-वरुण नाम से परमात्मा और जीवात्मा का विषय वर्णित है।