Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1133

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢व्या꣣ वा꣢रे꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣यो꣢꣫ हरि꣣र्व꣡ने꣢षु सीदति । रे꣣भो꣡ व꣢नुष्यते म꣣ती꣢ ॥११३३॥

अ꣡व्या꣢꣯ । वा꣡रे꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । प्रि꣣यः꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । व꣡ने꣢꣯षु । सी꣣दति । रेभः꣢ । व꣣नुष्यते । मती꣣ ॥११३३॥

Mantra without Swara
अव्या वारे परि प्रियो हरिर्वनेषु सीदति । रेभो वनुष्यते मती ॥

अव्या । वारे । परि । प्रियः । हरिः । वनेषु । सीदति । रेभः । वनुष्यते । मती ॥११३३॥

Samveda - Mantra Number : 1133
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(प्रियः), प्रिय (हरिः) चित्त को हरनेवाला वा दोषों को दूर करनेवाला आचार्य (अव्याः वारे) पृथिवी के चुने हुए स्थान पर (वनेषु) एकान्त जंगलों में (परि सीदति) स्थित होता है। (रेभः) विद्या का उपदेष्टा वह (मती) मति से (वनुष्यते) विद्या के विघ्नों को नष्ट करता है ॥६॥
Essence
विद्यारूप यज्ञ के लिए वन का एकान्त प्रदेश ही चुनना चाहिए, जहाँ विद्या में विघ्न डालनेवाले नगरों के प्रलोभन न हों ॥६॥
Subject
आगे पुनः वही विषय है।