Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1132

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मानो अ꣣भि꣢꣫ स्पृधो꣣ वि꣢शो꣣ रा꣡जे꣢व सीदति । य꣡दी꣢मृ꣣ण्व꣡न्ति꣢ वे꣣ध꣡सः꣢ ॥११३२॥

प꣡व꣢꣯मानः । अ꣣भि꣢ । स्पृ꣡धः꣢꣯ । वि꣡शः꣢꣯ । रा꣡जा꣢꣯ । इ꣣व । सीदति । य꣢त् । ई꣣म् । ऋण्व꣡न्ति꣢ । वे꣣ध꣡सः꣢ ॥११३२॥

Mantra without Swara
पवमानो अभि स्पृधो विशो राजेव सीदति । यदीमृण्वन्ति वेधसः ॥

पवमानः । अभि । स्पृधः । विशः । राजा । इव । सीदति । यत् । ईम् । ऋण्वन्ति । वेधसः ॥११३२॥

Samveda - Mantra Number : 1132
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जब (ईम्) इस आचार्य को (वेधसः) अन्य विद्वान् गुरु (ऋण्वन्ति) प्राप्त होते हैं, तब यह (विशः) प्रजाओं को (राजा इव) जैसे राजा वैसे (पवमानः) पवित्र आचरणवाला करता हुआ (स्पृधः) विद्यायज्ञ में विघ्न डालनेवाले स्पर्धालुओं को (अभि सीदति) दूर कर देता है ॥५॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥५॥
Essence
आचार्य दूसरे सुयोग्य गुरुजनों की सहायता से ही छात्रों को विद्वान् और पवित्र हृदयवाला करने में समर्थ होता है ॥५॥
Subject
आगे फिर गुरु-शिष्य का ही विषय है।