Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1131

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ य꣡त्काव्या꣢꣯ क꣣वि꣢र्नृ꣣म्णा꣡ पु꣢ना꣣नो꣡ अर्ष꣢꣯ति । स्व꣢꣯र्वा꣣जी꣡ सि꣢षासति ॥११३१॥

प꣡रि꣢꣯ । यत् । का꣡व्या꣢꣯ । क꣣विः꣢ । नृ꣣म्णा꣢ । पु꣣नानः꣢ । अ꣡र्ष꣢꣯ति । स्वः꣢ । वा꣣जी꣢ । सि꣣षासति ॥११३१॥

Mantra without Swara
परि यत्काव्या कविर्नृम्णा पुनानो अर्षति । स्वर्वाजी सिषासति ॥

परि । यत् । काव्या । कविः । नृम्णा । पुनानः । अर्षति । स्वः । वाजी । सिषासति ॥११३१॥

Samveda - Mantra Number : 1131
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(कविः) क्रान्तद्रष्टा, बुद्धिमान्, कविहृदय, विद्वान् आचार्य (नृम्णा) बलों को (पुनानः) पवित्र करता हुआ (यत्) जब (काव्या) वेदादि काव्यों की (परि अर्षति) व्याख्या करता है, तब (वाजी) बलवान् और विज्ञानवान् वह शिष्यों को (स्वः) आनन्द (सिषासति)प्रदान करना चाहता है ॥४॥
Essence
विद्वान् आचार्य की वेदादिशास्त्रों की व्याख्या शिष्यों को परमानन्द देनेवाली और उनकी ज्ञानवृद्धि करनेवाली होती है ॥४॥
Subject
आगे फिर वही विषय है।