Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1125

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣣मीचीना꣡स꣢ आशत꣣ हो꣡ता꣢रः स꣣प्त꣡जा꣢नयः । प꣣द꣡मे꣢꣯कस्य꣣ पि꣡प्र꣢तः ॥११२५॥

स꣣मीचीना꣡सः꣢ । स꣣म् । ईचीना꣡सः꣢ । आ꣣शत । हो꣡ता꣢꣯रः । स꣣प्त꣡जा꣢नयः । स꣣प्त꣢ । जा꣣नयः । पद꣢म् । ए꣡क꣢꣯स्य । पि꣡प्र꣢꣯तः ॥११२५॥

Mantra without Swara
समीचीनास आशत होतारः सप्तजानयः । पदमेकस्य पिप्रतः ॥

समीचीनासः । सम् । ईचीनासः । आशत । होतारः । सप्तजानयः । सप्त । जानयः । पदम् । एकस्य । पिप्रतः ॥११२५॥

Samveda - Mantra Number : 1125
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(समीचीनासः) भली-भाँति पढ़ाने आदि कर्म में तत्पर, (सप्तजानयः) अग्नि की सात ज्वालाएँ, जिन्हें पत्नी के समान प्रिय हैं अर्थात् जो अग्निहोत्री हैं, ऐसे (होतारः) विद्यायज्ञ के होता के समान विद्वान् गुरु लोग (एकस्य) एक परमेश्वर के (पदम्) स्वरूप को (पिप्रतः) छात्रों के अन्तःकरण में भरते हुए (आशत) विद्यागृह में कार्यरत रहते हैं ॥१०॥ अग्नि की सात ज्वालाएँ मु० उप० १।२।४ में प्रोक्त ‘काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरुची’ समझनी चाहिएँ ॥१०॥
Essence
गुरु-शिष्य आपस में मिलकर विद्या-यज्ञ को सिद्ध करेंऔर विविध विद्याओं के पढ़ने-पढ़ाने के साथ ब्रह्म के स्वरूप को भी साक्षात् करें तथा कराएँ ॥१०॥
Subject
आगे फिर गुरु-शिष्य का विषय है।