Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1119

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢ स्वा꣣ना꣢सो꣣ र꣡था꣢ इ꣣वा꣡र्व꣢न्तो꣣ न꣡ श्र꣢व꣣स्य꣡वः꣢ । सो꣡मा꣢सो रा꣣ये꣡ अ꣢क्रमुः ॥१११९॥

प्र । स्वा꣣ना꣡सः꣢ । र꣡थाः꣢꣯ । इ꣢व । अ꣡र्व꣢꣯न्तः । न । श्र꣣वस्य꣡वः꣢ । सो꣡मा꣢꣯सः । रा꣡ये꣢ । अ꣣क्रमुः ॥१११९॥

Mantra without Swara
प्र स्वानासो रथा इवार्वन्तो न श्रवस्यवः । सोमासो राये अक्रमुः ॥

प्र । स्वानासः । रथाः । इव । अर्वन्तः । न । श्रवस्यवः । सोमासः । राये । अक्रमुः ॥१११९॥

Samveda - Mantra Number : 1119
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(सोमासः) विद्वान् गुरु लोग (रथाः इव) रथों के समान (स्वानासः) शब्द करनेवाले और (अर्वन्तः इव) आक्रमणकारी योद्धाओं के समान (श्रवस्यवः) कीर्ति के इच्छुक होते हुए (राये) विद्यारूप ऐश्वर्य के लिए अर्थात् राष्ट्र में विद्यारूप ऐश्वर्य उत्पन्न करने के लिए (प्र अक्रमुः) उद्योग करते हैं ॥४॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥४॥
Essence
जैसे सड़क पर चलते हुए रथ शब्द करते हैं, वैसे ही गुरुजन पढ़ाते समय भाषण करते हैं। जैसे युद्ध करने में उद्भट योद्धागण विजय की कीर्ति चाहते हैं, वैसे ही गुरु लोग राष्ट्र में सुयोग्य विद्वानों को उत्पन्न करके उनसे प्राप्त होनेवाली कीर्ति की कामना करते हैं ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में गुरुओं का वर्णन है।