Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1107

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- बन्धुः सुबन्धुः श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च क्रमेण गौपायना लौपायना वा Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ त्वं꣢ नो꣣ अ꣡न्त꣢म उ꣣त꣢ त्रा꣣ता꣢ शि꣣वो꣡ भु꣢वो वरू꣣꣬थ्यः꣢꣯ ॥११०७॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । त्वम् । नः꣣ । अ꣡न्त꣢꣯मः । उ꣣त꣢ । त्रा꣣ता꣢ । शि꣡वः꣢ । भु꣣वः । वरू꣢थ्यः ॥११०७॥

Mantra without Swara
अग्ने त्वं नो अन्तम उत त्राता शिवो भुवो वरूथ्यः ॥

अग्ने । त्वम् । नः । अन्तमः । उत । त्राता । शिवः । भुवः । वरूथ्यः ॥११०७॥

Samveda - Mantra Number : 1107
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन्, राजन् वा विद्वन् आचार्य ! आप (नः) हमारे (अन्तमः) निकटतम (उत) और (त्राता) अपराधों से रक्षा करनेवा्ले, तथा (शिवः) मङ्गलकारी, (वरूथ्यः) और वरणीय (भुवः) होओ ॥१॥
Essence
परमात्मा, राजा और आचार्य का संरक्षण पाकर लोग दोषों से मुक्त, निरपराध, निश्छल, निष्पाप,विद्वान्, ब्रह्मज्ञ और सदाचारी हो जाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ४४८ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ परमात्मा, राजा और आचार्य तीनों का विषय है।