Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1105

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ꣣त꣡ न꣢ ए꣣ना꣡ प꣢व꣣या꣡ प꣢व꣣स्वा꣡धि꣢ श्रु꣣ते꣢ श्र꣣वा꣡य्य꣢स्य ती꣣र्थे꣢ । ष꣣ष्टि꣢ꣳ स꣣ह꣡स्रा꣢ नैगु꣣तो꣡ वसू꣢꣯नि वृ꣣क्षं꣢꣫ न प꣣क्वं꣡ धू꣢नव꣣द्र꣡णा꣢य ॥११०५॥

उ꣣त꣢ । नः꣣ । एना꣢ । प꣣वया꣢ । प꣢वस्व । अ꣡धि꣢꣯ । श्रु꣣ते꣢ । श्र꣣वा꣡य्य꣢स्य । ती꣣र्थे꣢ । ष꣣ष्टि꣢म् । स꣣ह꣡स्रा꣢ । नै꣣गुतः꣢ । नै꣣ । गुतः꣢ । व꣡सू꣢꣯नि । वृ꣣क्ष꣢म् । न । प꣣क्व꣡म् । धू꣣नवत् । र꣡णा꣢꣯य ॥११०५॥

Mantra without Swara
उत न एना पवया पवस्वाधि श्रुते श्रवाय्यस्य तीर्थे । षष्टिꣳ सहस्रा नैगुतो वसूनि वृक्षं न पक्वं धूनवद्रणाय ॥

उत । नः । एना । पवया । पवस्व । अधि । श्रुते । श्रवाय्यस्य । तीर्थे । षष्टिम् । सहस्रा । नैगुतः । नै । गुतः । वसूनि । वृक्षम् । न । पक्वम् । धूनवत् । रणाय ॥११०५॥

Samveda - Mantra Number : 1105
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(पूतासः) पवित्र, (विपश्चितः) विद्वान्, (दध्याशिरः) ज्ञान के धारणकर्त्ता और परिपक्व, (सूरासः न) सूर्यों के समान (दर्शतासः) दर्शनीय तथा दृष्टि देनेवाले, (जिगत्नवः) गतिमान् एवं कर्मण्य और (घृते) विवेक के प्रकाश में (ध्रुवाः) स्थिर रहनेवाले जो हों, (ते) वे ही (सोमासः) विद्या, धर्म, आदि की प्रेरणा करनेवाले गुरु और राजपुरुष होवें ॥२॥
Essence
जो पवित्र आचरणवाले, विविध विद्याओं को पढ़े हुए, दूसरों की सहायता करनेवाले, परिपक्वमति, सूर्य के समान प्रकाशक, कर्मशूर स्थिर प्रकाशवाले, विघ्नों से बार-बार प्रहार किये जाते हुए भी ग्रहण किये कार्य को न छोड़नेवाले गुरु और राजपुरुष होते हैं, वे ही सफल होते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर गुरुजन और राजपुरुषों का वर्णन है।