Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1094

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं꣢꣫ विप्र꣣स्त्वं꣢ क꣣वि꣢꣫र्मधु꣣ प्र꣢ जा꣣त꣡मन्ध꣢꣯सः । म꣡दे꣢षु सर्व꣣धा꣡ अ꣢सि ॥१०९४॥

त्व꣢म् । वि꣡प्रः꣢꣯ । वि । प्रः꣣ । त्व꣢म् । क꣣विः꣢ । म꣡धु꣢꣯ । प्र । जा꣣त꣢म् । अ꣡न्ध꣢꣯सः । म꣡दे꣢꣯षु । स꣣र्वधाः꣢ । स꣣र्व । धाः꣢ । अ꣣सि ॥१०९४॥

Mantra without Swara
त्वं विप्रस्त्वं कविर्मधु प्र जातमन्धसः । मदेषु सर्वधा असि ॥

त्वम् । विप्रः । वि । प्रः । त्वम् । कविः । मधु । प्र । जातम् । अन्धसः । मदेषु । सर्वधाः । सर्व । धाः । असि ॥१०९४॥

Samveda - Mantra Number : 1094
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे सोम अर्थात् ज्ञानरस के भण्डार आचार्य ! (त्वं विप्रः) आप ब्राह्मण-स्वभाववाले हो, (त्वं कविः) आप मेधावी और विद्वान् हो। आपके (अन्धसः) ज्ञानरस से (मधु प्रजातम्) मधुर ब्रह्मानन्द प्राप्त होता है। आप (मदेषु) प्रदत्त विद्यानन्दों में (सर्वधाः) सब शिष्यों के धारणकर्ता (असि) होते हो ॥२॥
Essence
ज्ञान के अगाध समुद्र, ब्राह्मणवृत्ति, मेधावी, विद्वान् आचार्य से जो भौतिक और दिव्य ज्ञान तथा उस ज्ञान से उत्पन्न आनन्द प्राप्त होता है, उसके कारण वह सबका पूज्य होता है ॥२॥
Subject
आगे फिर गुरु-शिष्य का विषय वर्णित है।