Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1088

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ नः꣣ स꣢व꣣ना꣡ ग꣢हि꣣ सो꣡म꣢स्य सोमपाः पिब । गो꣣दा꣢꣫ इद्रे꣣व꣢तो꣣ म꣡दः꣢ ॥१०८८॥

उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । स꣡व꣢꣯ना । आ । ग꣣हि । सो꣡म꣢꣯स्य । सो꣡मपाः । सोम । पाः । पिब । गोदाः꣢ । गो꣣ । दाः꣢ । इत् । रे꣣व꣡तः꣢ । म꣡दः꣢꣯ ॥१०८८॥

Mantra without Swara
उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब । गोदा इद्रेवतो मदः ॥

उप । नः । सवना । आ । गहि । सोमस्य । सोमपाः । सोम । पाः । पिब । गोदाः । गो । दाः । इत् । रेवतः । मदः ॥१०८८॥

Samveda - Mantra Number : 1088
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे इन्द्र अर्थात् परमात्मा, राजा, आचार्य, योगी वा शिल्पकार ! आप (नः) हमारे (सवना) उपासना-यज्ञों में, प्रजाओं से किये गये उत्सवों में, शिक्षा-सत्रों में, योग-शिविरों में वा शिल्प-यज्ञों में (आगहि) आओ (सोमपाः) रस का पान करनेवाले आप (सोमस्य) भक्ति-रस, वीर-रस, विद्या-रस, ध्यान-रस वा कला-रस को (पिब) पान करो। (रेवतः) ऐश्वर्यवान् आपका (मदः) उत्साह (इत्) सचमुच (गोदाः) अध्यात्म प्रकाशों का, गायों का, वेदवाणियों का, योगशास्त्र के वचनों का वा शिल्पशास्त्र के वचनों का देनेवाला है ॥२॥
Essence
परमात्मा की उपासना करके और राजा, आचार्य, योगी तथा शिल्पकार का सत्कार करके उनसे यथायोग्य लाभ सबको पाना चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा, राजा, आचार्य योगी और शिल्पकार का विषय वर्णित है।