Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1081

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अमहीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣त꣢मु꣣ त्यं꣢꣫ दश꣣ क्षि꣡पो꣢ मृ꣣ज꣢न्ति꣣ सि꣡न्धु꣢मातरम् । स꣡मा꣢दि꣣त्ये꣡भि꣢रख्यत ॥१०८१॥

ए꣣त꣢म् । उ꣣ । त्य꣢म् । द꣡श꣢꣯ । क्षि꣡पः꣢꣯ । मृ꣣ज꣡न्ति꣢ । सि꣡न्धु꣢꣯मातरम् । सि꣡न्धु꣢꣯ । मा꣣तरम् । स꣢म् । आ꣣दित्ये꣡भिः꣢ । आ꣣ । दित्ये꣡भिः꣢ । अ꣡ख्यत ॥१०८१॥

Mantra without Swara
एतमु त्यं दश क्षिपो मृजन्ति सिन्धुमातरम् । समादित्येभिरख्यत ॥

एतम् । उ । त्यम् । दश । क्षिपः । मृजन्ति । सिन्धुमातरम् । सिन्धु । मातरम् । सम् । आदित्येभिः । आ । दित्येभिः । अख्यत ॥१०८१॥

Samveda - Mantra Number : 1081
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(सिन्धुमातरम्) आनन्द-रस बहानेवाली जगदम्बा जिसकी माता है, ऐसे (एतम् उ त्यम्) इस उस सोम नामक जीवात्मा को (दश क्षिपः) इन्द्रियदोषों को दूर फेंकनेवाले दस प्राण (मृजन्ति) अलङ्कृत करते हैं। यह सोम जीवात्मा (आदित्येभिः) सूर्य के समान ज्ञानप्रकाश से प्रकाशित गुरुजनों से (सम् अख्यत) विद्याप्रकाश को प्राप्त करता है ॥१॥
Essence
प्राणों से युक्त ही मनुष्य का आत्मा शरीर को जीवित किये रखता है और शरीर का अधिष्ठातृत्व करता है। गुरुओं के उपदेश के विना वह स्वयं ज्ञानी नहीं होता ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में जीवात्मा का विषय वर्णित है।