Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1071

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡स्य꣢ ते꣣ वि꣡श्व꣢मानु꣣ष꣡ग्भूरे꣢꣯र्द꣣त्त꣢स्य꣣ वे꣡द꣢ति । व꣡सु꣢ स्पा꣣र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥१०७१॥

य꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । वि꣡श्व꣢꣯म् । अ꣣नुष꣢क् । अ꣣नु । स꣢क् । भू꣡रेः꣢꣯ । द꣣त्त꣡स्य꣢ । वे꣡द꣢꣯ति । व꣡सु꣢꣯ । स्पा꣣र्ह꣢म् । तत् । आ । भ꣣र ॥१०७१॥

Mantra without Swara
यस्य ते विश्वमानुषग्भूरेर्दत्तस्य वेदति । वसु स्पार्हं तदा भर ॥

यस्य । ते । विश्वम् । अनुषक् । अनु । सक् । भूरेः । दत्तस्य । वेदति । वसु । स्पार्हम् । तत् । आ । भर ॥१०७१॥

Samveda - Mantra Number : 1071
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे इन्द्र अर्थात् ऐश्वर्यशाली परमात्मन् ! (यस्य ते) जिस तेरे (भूरेः) बहुत अधिक (दत्तस्य) दिये हुए धन के विषय में (विश्वम्) सारा संसार (आनुषक्) निरन्तर (वेदति) जानता है, (तत्) उस (स्पार्हम्) चाहने योग्य (वसु) आध्यात्मिक तथा भौतिक धन को (आ भर) हमें भी प्रदान कर ॥३॥
Essence
ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी धन बिखरा पड़ा है, वह सब परमात्मा का दिया हुआ ही है। हम भी अपने पुरुषार्थ से उस धन के भागी बनें ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना की गयी है।