Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1055

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वां꣢ य꣣ज्ञै꣡र꣢वीवृध꣣न्प꣡व꣢मान꣣ वि꣡ध꣢र्मणि । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५५॥

त्वा꣢म् । य꣣ज्ञैः꣢ । अ꣣वीवृधन् । प꣡व꣢꣯मान । वि꣡ध꣢꣯र्मणि । वि । ध꣣र्मणि । अ꣡थ꣢꣯ । नः । व꣡स्य꣢꣯सः । कृ꣣धि ॥१०५५॥

Mantra without Swara
त्वां यज्ञैरवीवृधन्पवमान विधर्मणि । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

त्वाम् । यज्ञैः । अवीवृधन् । पवमान । विधर्मणि । वि । धर्मणि । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०५५॥

Samveda - Mantra Number : 1055
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (पवमान) जन-मानस को पवित्रता देनेवाले, क्रियाशील परमात्मन् वा राजन् ! (विधर्मणि) विशेष-धर्म-युक्त अन्तरात्मा में वा राष्ट्र में (त्वाम्) आप परमात्मा वा राजा को (यज्ञैः) उपासनायज्ञों वा राष्ट्रयज्ञों से प्रजाएँ (अवीवृधन्) बढ़ाती हैं। (अथ) अतः, आप (नः) हमें (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर दीजिए ॥९॥
Essence
परमेश्वर को उपासना द्वारा अन्तरात्मा में बढ़ाकर और राजा को राष्ट्रसेवा रूप यज्ञों से राष्ट्र में बढ़ाकर उनकी सहायता से प्राप्त कीर्तियों तथा ऐश्वर्यों से प्रजाजन यशस्वी और ऐश्वर्यवान् होवें ॥९॥
Subject
आगे पुनः वही विषय है।