Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1050

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡वी꣢तारः पुनी꣣त꣢न꣣ सो꣢म꣣मि꣡न्द्रा꣢य꣣ पा꣡त꣢वे । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५०॥

प꣡वी꣢꣯तारः । पु꣣नीत꣡न꣢ । पु꣣नी꣢त । ꣣न । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । पा꣡त꣢꣯वे । अ꣡थ꣢꣯ । नः । व꣡स्य꣢꣯सः । कृ꣣धि ॥१०५०॥

Mantra without Swara
पवीतारः पुनीतन सोममिन्द्राय पातवे । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

पवीतारः । पुनीतन । पुनीत । न । सोमम् । इन्द्राय । पातवे । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०५०॥

Samveda - Mantra Number : 1050
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (पवीतारः) पवित्रता के कार्य में संलग्न मनुष्यो ! तुम (इन्द्राय पातवे) जीवात्मा के पान के लिए (सोमम्) ज्ञान, कर्म, उपासना के रस को (पुनीतन) पवित्र करो। (अथ) और उसके अनन्तर, हे पवित्र ज्ञान, कर्म, उपासनावाले मानव। तू (नः) हमें भी (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर ॥४॥
Essence
जिनके ज्ञान, कर्म और उपासना पवित्र होते हैं, उनकी सङ्गति से दूसरे लोग भी पवित्र अन्तःकरणवाले तथा ऐश्वर्यवान् हो जाते हैं ॥४॥
Subject
अब मनुष्यों को प्रेरित करते हैं।