Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1046

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣स्म꣡भ्य꣢मिन्दविन्द्रि꣣यं꣡ मधोः꣢꣯ पवस्व꣣ धा꣡र꣢या । प꣣र्ज꣡न्यो꣢ वृष्टि꣣मा꣡ꣳ इ꣢व ॥१०४६॥

अ꣣स्म꣡भ्य꣢म् । इ꣣न्दो । इन्द्रिय꣢म् । म꣡धोः꣢꣯ । प꣣वस्व । धा꣡र꣢꣯या । प꣣र्ज꣡न्यः꣢ । पृ꣣ष्टिमा꣢न् । इ꣣व ॥१०४६॥

Mantra without Swara
अस्मभ्यमिन्दविन्द्रियं मधोः पवस्व धारया । पर्जन्यो वृष्टिमाꣳ इव ॥

अस्मभ्यम् । इन्दो । इन्द्रियम् । मधोः । पवस्व । धारया । पर्जन्यः । पृष्टिमान् । इव ॥१०४६॥

Samveda - Mantra Number : 1046
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्दो) रस के भण्डार, करुणासागर परमेश ! (वृष्टिमान्) वर्षा करनेवाले (पर्जन्यः इव) बादल के समान, आप (मधोः) मधुर आनन्द-रस की (धारया) धारा के साथ (अस्मभ्यम्) हम उपासकों के लिए (इन्द्रियम्) जीवात्मा से सेवित आत्मबल (पवस्व) प्रवाहित कीजिए ॥१०॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१०॥
Essence
बादल की रस-वर्षा से पृथिवी के समान परमेश्वर की आनन्द-वर्षा से मनुष्य की आत्मभूमि सरस, सद्गुणों से अङ्कुरित और हरी-भरी हो जाती है ॥१०॥ इस खण्ड में परमात्मा के गुण-कर्मों का, उपास्य-उपासक सम्बन्ध का, ब्रह्मानन्द-रस का और प्रसङ्गतः पर्जन्य का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ सप्तम अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अब परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।