Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1044

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣢ त्वा꣣ म꣡दा꣢य꣣ घृ꣡ष्व꣢य उ लोककृ꣣त्नु꣡मी꣢महे । त꣢व꣣ प्र꣡श꣢स्तये म꣣हे꣢ ॥१०४४॥

तम् । त्वा꣣ । म꣡दा꣢꣯य । घृ꣡ष्व꣢꣯ये । उ꣣ । लोककृत्नु꣢म् । लो꣣क । कृत्नु꣢म् । ई꣣महे । त꣡व꣢꣯ । प्र꣡श꣢꣯स्तये । प्र । श꣣स्तये । म꣢हे ॥१०४४॥

Mantra without Swara
तं त्वा मदाय घृष्वय उ लोककृत्नुमीमहे । तव प्रशस्तये महे ॥

तम् । त्वा । मदाय । घृष्वये । उ । लोककृत्नुम् । लोक । कृत्नुम् । ईमहे । तव । प्रशस्तये । प्र । शस्तये । महे ॥१०४४॥

Samveda - Mantra Number : 1044
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता रसागार परमात्मन् ! (तम् उ) उस (लोककृत्नुम्) लोकों के रचयिता (त्वा) तुझे हम (घृष्वये) बुराईयों से संघर्ष करने में समर्थ (मदाय) उत्साह के लिए (ईमहे) प्राप्त करते हैं। हम (महे) महती (प्रशस्तये) प्रशस्ति पाने के लिए (तव) तेरे हो जाएँ ॥८॥
Essence
परमात्मा के साथ मित्रता संस्थापित करके ही मनुष्य जीवन में सफलता, विजय और यश पा सकता है ॥८॥
Subject
अब उपासक परमात्मा को कह रहा है।