Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1036

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ते꣡ विश्वा꣢꣯ दा꣣शु꣢षे꣣ व꣢सु꣣ सो꣡मा꣢ दि꣣व्या꣢नि꣣ पा꣡र्थि꣢वा । प꣡व꣢न्ता꣣मा꣡न्तरि꣢꣯क्ष्या ॥१०३६॥

ते । वि꣡श्वा꣢꣯ । दा꣣शु꣡षे꣢ । व꣡सु꣢꣯ । सो꣡माः꣢꣯ । दि꣣व्या꣡नि꣢ । पा꣡र्थि꣢꣯वा । प꣡व꣢꣯न्ताम् । आ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्ष्या ॥१०३६॥

Mantra without Swara
ते विश्वा दाशुषे वसु सोमा दिव्यानि पार्थिवा । पवन्तामान्तरिक्ष्या ॥

ते । विश्वा । दाशुषे । वसु । सोमाः । दिव्यानि । पार्थिवा । पवन्ताम् । आ । अन्तरिक्ष्या ॥१०३६॥

Samveda - Mantra Number : 1036
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(ते सोमाः) उपासक के अन्तरात्मा में बहते हुए वे ब्रह्मानन्द-रस (दाशुषे) परमात्मा को आत्मसमर्पण करनेवाले उस उपासक के लिए (दिव्यानि) आनन्दमय और विज्ञानमय लोकों से सम्बद्ध, (पार्थिवा) अन्नमय और प्राणमय लोकों से सम्बद्ध तथा (आन्तरिक्ष्या) मनोमय लोक से सम्बद्ध (विश्वा वसु) सब ऐश्वर्यों को (पवन्ताम्) प्रवाहित करें ॥३॥
Essence
ब्रह्मानन्द अधिगत हो जाने पर देह, प्राण, मन, बुद्धि एवं आत्मा से सम्बद्ध सभी सम्पदाएँ वा सिद्धियाँ योगियों को प्राप्त हो जाती हैं ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि ब्रह्मानन्द-रस क्या करें।