Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1025

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ सा꣡म꣢ गायत꣣ वि꣡प्रा꣢य बृह꣣ते꣢ बृ꣣ह꣢त् । ब्र꣣ह्मकृ꣡ते꣢ विप꣣श्चि꣡ते꣢ पन꣣स्य꣡वे꣢ ॥१०२५॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सा꣡म꣢꣯ । गा꣣यत । वि꣡प्रा꣢꣯य । वि । प्रा꣣य । बृहते꣢ । बृ꣣ह꣢त् । ब्र꣣ह्मकृ꣡ते꣢ । ब्र꣣ह्म । कृ꣡ते꣢꣯ । वि꣣पश्चि꣡ते꣢ । वि꣣पः । चि꣡ते꣢꣯ । प꣣नस्य꣡वे꣢ ॥१०२५॥

Mantra without Swara
इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत् । ब्रह्मकृते विपश्चिते पनस्यवे ॥

इन्द्राय । साम । गायत । विप्राय । वि । प्राय । बृहते । बृहत् । ब्रह्मकृते । ब्रह्म । कृते । विपश्चिते । विपः । चिते । पनस्यवे ॥१०२५॥

Samveda - Mantra Number : 1025
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे शिष्यो ! तुम (विप्राय) मेधावी, (बृहते) महान्, (ब्रह्मकृते) जल, अन्न, धन, वेद, विद्युत्, प्राण, मन, वाणी, श्रोत्र, हृदय आदियों के रचयिता, (विपश्चिते) विद्वान् सर्वज्ञ (पनस्यवे) दूसरों को स्तुतिमान् अर्थात् कीर्तिमान् बनाना चाहनेवाले, (इन्द्राय) विघ्नों के विदारक परमेश्वर के लिए (बृहत् साम) ‘त्वामिद्धि हवामहे’ साम०, २३४, ८०९ इस ऋचा पर गाये जानेवाले बृहत् नामक साम को (गायत) गाओ ॥१॥
Essence
आचार्य के अधीन गुरुकुल में निवास करनेवाले शिष्यों को चाहिए कि वे अनेक गुणोंवाले जगदीश्वर को लक्ष्य करके बृहत् आदि सामों को गायें और स्वयं भी उसके गुणों का अनुकरण करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ३८८ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ आचार्य शिष्यों को कह रहा है।