Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1017

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेभसूनू काश्यपौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
त्वा꣡ꣳ रि꣢꣯हन्ति धी꣣त꣢यो꣣ ह꣡रिं꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अ꣣द्रु꣡हः꣢ । व꣣त्सं꣢ जा꣣तं꣢꣫ न मा꣣त꣢रः꣣ प꣡व꣢मा꣣न वि꣡ध꣢र्मणि ॥१०१७॥

त्वाम् । रि꣣हन्ति । धीत꣡यः꣢ । ह꣡रि꣢꣯म् । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣द्रु꣡हः꣢ । अ꣣ । द्रु꣡हः꣢꣯ । व꣡त्स꣢म् । जा꣣त꣢म् । न । मा꣣त꣡रः꣢ । प꣡वमा꣢꣯न । वि꣡ध꣢꣯र्मणि । वि । ध꣣र्मणि ॥१०१७॥

Mantra without Swara
त्वाꣳ रिहन्ति धीतयो हरिं पवित्रे अद्रुहः । वत्सं जातं न मातरः पवमान विधर्मणि ॥

त्वाम् । रिहन्ति । धीतयः । हरिम् । पवित्रे । अद्रुहः । अ । द्रुहः । वत्सम् । जातम् । न । मातरः । पवमान । विधर्मणि । वि । धर्मणि ॥१०१७॥

Samveda - Mantra Number : 1017
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (पवमान) पवित्रतादायक रस के भण्डार जगदीश्वर (हरिम्) पाप के हरनेवाले आपको (विधर्मणि) विशेषरूप से सद्गुणों के धारक (पवित्रे) पवित्र अन्तरात्मा में (अद्रुहः) द्रोहरहित (धीतयः) धी-वृत्तियाँ (रिहन्ति) चाटती हैं, ध्याती हैं, (जातम्) नवजात (वत्सम्) बछड़े को (मातरः न) जैसे गौ माताएँ चाटती हैं ॥२॥
Essence
जैसे धेनुएँ अपने बछड़े को जीभ से चाटती हुई आनन्द अनुभव करती हैं, वैसे ही मनुष्य परमात्मा को ध्याते हुए आनन्द से तरङ्गित होते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में जगदीश्वर का वर्णन है।