Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1016

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेभसूनू काश्यपौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व꣣ वा꣡ज꣢सातये प꣣वि꣢त्रे꣣ धा꣡र꣢या सु꣣तः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢य सोम꣣ वि꣡ष्ण꣢वे दे꣣वे꣢भ्यो꣣ म꣡धु꣢मत्तरः ॥१०१६॥

प꣡व꣢꣯स्व । वा꣡ज꣢꣯सातये । वा꣡ज꣢꣯ । सा꣣तये । पवि꣡त्रे꣢ । धा꣡र꣢꣯या । सु꣣तः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सो꣣म । वि꣡ष्ण꣢꣯वे । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । म꣡धु꣢꣯मत्तरः ॥१०१६॥

Mantra without Swara
पवस्व वाजसातये पवित्रे धारया सुतः । इन्द्राय सोम विष्णवे देवेभ्यो मधुमत्तरः ॥

पवस्व । वाजसातये । वाज । सातये । पवित्रे । धारया । सुतः । इन्द्राय । सोम । विष्णवे । देवेभ्यः । मधुमत्तरः ॥१०१६॥

Samveda - Mantra Number : 1016
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) रस के भण्डार जगत्पति परमात्मन् ! (सुतः) आत्मा में प्रकट हुए, (मधुमत्तरः) अत्यन्त मधुर आप (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए, (विष्णवे) शरीर में व्यापक प्राण के लिए और (देवेभ्यः) इन्द्रियों के लिए (वाजसातये) बलप्रदानार्थ (पवित्रे) पवित्र हृदय में (धारया) आनन्द की धारा के साथ (पवस्व) प्रवाहित होओ ॥१॥
Essence
परमात्मा के पास से आनन्द का झरना झरने पर जीवात्मा, मन, बुद्धि आदि सभी रस से सिक्त और कृतकृत्य हो जाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में जगदीश्वर का आह्वान है।