Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1014

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्रि꣣त꣡स्य꣢ पा꣣ष्यो꣢३꣱र꣡भ꣢क्त꣣ य꣡द्गुहा꣢꣯ प꣣द꣢म् । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ स꣣प्त꣡ धाम꣢꣯भि꣣र꣡ध꣢ प्रि꣣य꣢म् ॥१०१४॥

उ꣡प꣢꣯ । त्रि꣣त꣡स्य꣢ । पा꣣ष्योः꣢ । अ꣡भ꣢꣯क्त । यत् । गु꣡हा꣢꣯ । प꣡द꣢म् । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । स꣣प्त꣢ । धा꣡म꣢꣯भिः । अ꣡ध꣢꣯ । प्रि꣣य꣢म् ॥१०१४॥

Mantra without Swara
उप त्रितस्य पाष्यो३रभक्त यद्गुहा पदम् । यज्ञस्य सप्त धामभिरध प्रियम् ॥

उप । त्रितस्य । पाष्योः । अभक्त । यत् । गुहा । पदम् । यज्ञस्य । सप्त । धामभिः । अध । प्रियम् ॥१०१४॥

Samveda - Mantra Number : 1014
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यत्) क्योंकि, वह पवमान सोम अर्थात् सर्वान्तर्यामी जगत्स्रष्टा परमेश्वर (पाष्योः) द्यावापृथिवी की (गुहा) गुफाओं में भी (त्रितस्य) पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ रूप तीन स्थानों में स्थित सूर्य के (पदम्) किरण-समूह को (उप अभक्त) पहुँचाता है, (अध) इस कारण (यज्ञस्य) शरीर में सङ्गत जीवात्मा के (सप्त धामभिः) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इन सात धामों से (प्रियम्) उस प्रिय परमेश्वर की पूजा करो ॥२॥
Essence
परमात्मा की कैसी अद्भुत व्यवस्था है कि सूर्य की किरणें विभिन्न लोकों के भूगर्भ में भी पहुँचकर वहाँ अपने ताप से सुवर्ण आदि धातुओं को उत्पन्न कर देती हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा का विषय है।