Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1013

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प्रा꣣णा꣡ शिशु꣢꣫र्म꣣ही꣡ना꣢ꣳ हि꣣न्व꣢न्नृ꣣त꣢स्य꣣ दी꣡धि꣢तिम् । वि꣢श्वा꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣या꣡ भु꣢व꣣द꣡ध꣢ द्वि꣣ता꣢ ॥१०१३॥

प्रा꣣णा꣢ । प्र꣣ । आना꣢ । शि꣡शुः꣢꣯ । म꣣ही꣡ना꣢म् । हि꣣न्व꣢न् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । दी꣡धि꣢꣯तिम् । वि꣡श्वा꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । प्रि꣣या꣢ । भु꣣वत् । अ꣡ध꣢꣯ । द्वि꣡ता꣢ ॥१०१३॥

Mantra without Swara
प्राणा शिशुर्महीनाꣳ हिन्वन्नृतस्य दीधितिम् । विश्वा परि प्रिया भुवदध द्विता ॥

प्राणा । प्र । आना । शिशुः । महीनाम् । हिन्वन् । ऋतस्य । दीधितिम् । विश्वा । परि । प्रिया । भुवत् । अध । द्विता ॥१०१३॥

Samveda - Mantra Number : 1013
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(प्राणा) सबको प्राण देनेवाला, (शिशुः) शिशु के समान प्रेम करने योग्य, (महीनाम्) मङ्गल, बुध, बृहस्पति, चन्द्रमा आदि की भूमियों के पृष्ठ पर (ऋतस्य) सूर्य की (दीधितिम्) किरणावलि को (हिन्वन्) भेजता हुआ, पवमान सोम अर्थात् सर्वान्तर्यामी परमेश्वर (विश्वा) सब (प्रिया) प्रिय वस्तुओं में (परि भुवत्) चारों ओर से व्याप्त है। (अध) और (द्विता) दो प्रकार के इसके कार्य हैं—बर्फ, नद, नदी, समुद्र, चन्द्रमा, बादल आदि सौम्य कार्य तथा आग, बिजली, सूर्य, आदि तैजस कार्य ॥१॥
Essence
जो जगदीश्वर सब प्राणियों को प्राण देता है, सूर्य के प्रकाश को सब जगह बिखेरता है, सर्वान्तर्यामी होता हुआ सब जगत् की व्यवस्था करता है, उसकी सब मनुष्य आराधना क्यों न करें? ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ५७० क्रमाङ्क पर परमात्मा के महत्त्व के विषय में व्याख्या की गयी थी। यहाँ वही विषय प्रकारान्तर से कहा जा रहा है।