Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1010

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢दी꣣म꣢श्वं꣣ न꣡ हेता꣢꣯र꣣म꣡शू꣢शुभन्न꣣मृ꣡ता꣢य । म꣢धो꣣ र꣡स꣢ꣳ सध꣣मा꣡दे꣢ ॥१०१०॥

आत् । ई꣣म् । अ꣡श्व꣢꣯म् । न । हे꣡ता꣢꣯रम् । अ꣡शू꣢꣯शुभन् । अ꣣मृ꣡ता꣢य । अ꣣ । मृ꣡ता꣢꣯य । म꣡धोः꣢꣯ । र꣡स꣢꣯म् । स꣣धमा꣡दे꣢ । स꣣ध । मा꣡दे꣢꣯ ॥१०१०॥

Mantra without Swara
आदीमश्वं न हेतारमशूशुभन्नमृताय । मधो रसꣳ सधमादे ॥

आत् । ईम् । अश्वम् । न । हेतारम् । अशूशुभन् । अमृताय । अ । मृताय । मधोः । रसम् । सधमादे । सध । मादे ॥१०१०॥

Samveda - Mantra Number : 1010
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—सोम ओषधि के रस के विषय में। (आत्) उसके अनन्तर अर्थात् सोमरस में गाय का दूध मिलाने के पश्चात्, (हेतारम्) बल बढ़ानेवाले (ईम् मधोः रसम्) इस मधुर सोम के रस को, योद्धा लोग (अमृताय) युद्ध में विजय की प्राप्ति के निमित्त (अशूशुभन्) पीने के लिए पात्रों में अलङ्कृत करते हैं, (हेतारम् अश्वं न) जैसे शीघ्रगामी घोड़े को अश्वपाल योग्य अलङ्कारों से अलङ्कृत करते हैं ॥ द्वितीय—ज्ञानरस के विषय में (आत्) गुरु के पास से ज्ञान की उपलब्धि के अनन्तर (हेतारम्) पुरुषार्थ को बढ़ानेवाले (ईम् मधोः रसम्) इस मधुर ज्ञानरस को, शिष्यगण (अमृताय) मोक्ष की प्राप्ति के लिए (अशूशुभन्) योगाभ्यासों से अलङ्कृत करते हैं ॥३॥ यहाँ श्लेष और श्लिष्टोपमा अलङ्कार हैं ॥३॥
Essence
जैसे पिया हुआ सोम ओषधि का रस बल की वृद्धि करनेवाला होता हुआ युद्ध में विजय प्राप्त कराता है, वैसे ही आचार्य से ग्रहण किया गया ज्ञान योगाभ्यास से मिलकर मोक्ष प्राप्त कराता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर वही विषय है।