SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 915

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢꣫त्राह꣣ गो꣡र꣢मन्वत꣣ ना꣢म꣣ त्व꣡ष्टु꣢रपी꣣꣬च्य꣢꣯म् । इ꣣त्था꣢ च꣣न्द्र꣡म꣢सो गृ꣣हे꣢ ॥९१५॥

अ꣡त्र꣢꣯ । अ꣡ह꣢꣯ । गोः । अ꣣मन्वत । ना꣡म꣢꣯ । त्व꣡ष्टुः꣢꣯ । अ꣡पीच्य꣢म् । इ꣣त्था꣢ । च꣣न्द्र꣡म꣢सः । च꣣न्द्र꣢ । म꣣सः । गृहे꣣ ॥९१५॥

Mantra without Swara
अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम् । इत्था चन्द्रमसो गृहे ॥

अत्र । अह । गोः । अमन्वत । नाम । त्वष्टुः । अपीच्यम् । इत्था । चन्द्रमसः । चन्द्र । मसः । गृहे ॥९१५॥

Samveda - Mantra Number : 915
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अत्र अह) इस ही (चन्द्रमसो गृहे) चन्द्रमा [मन] के घर [ हृदय ] में, योगी जनों ने, — (अमन्वत) माना हैं, (गौः) इन्द्रियों का (अपीच्यम्) अन्तर्हित होना, तथा (त्वष्टुः) कारीगर परमेश्वर का (अगीच्यम्) अन्तर्हित होना, —(इत्था) यह सत्य है ।
Footnote
[ इत्था = सत्यनाम (निघ० ३। १०) । चन्द्रमसः गृहे—यजुर्वेद में चन्द्रमा को मन का प्रतिनिधि माना हैं । जैसे शरीर में मन हैं, वैसे ब्रह्माण्ड में चन्द्रमा है । “चन्द्रमा मनसो जातः” (यजु० ३१। १२) । अतः आध्यात्मिक-दृष्टि में मन्त्र में “चन्द्रमसः” पद द्वारा मन का ग्रहण किया है । मन का घर है हृदय । यथा—“हृदये चित्तसंवित्” (योग० ३। ३४) । अर्थात् “चित्त [मन] का ज्ञान” हृदय में होता है । गौः = गौ का अर्थ है इन्द्रियाँ । उणादि कोष २। ६७ की व्याख्या में महर्षि दयानन्द लिखते हैं कि “गोः = पशुः, इन्द्रियं सुखं, किरण:, वज्रं, चन्द्रमा, भूमिः, वाणी, जलं वा” । “गौ” अर्थात् इन्द्रियों और “चन्द्रमा” अर्थात् मन को जब हृदय में लीन किया जाता है, और “ओ३म्” के जप का अभ्यास किया जाता है, तब हृदय में लीन हुए “त्वष्टा” अर्थात् कारीगर परमेश्वर का प्रत्यक्ष होता है, और साथ ही इन्द्रियों पर विजय प्राप्त हो जाता है । यथाः—
त्रिरुन्नहं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संविरुध्य ।
ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ (श्वेता० उप० २। ८)
[ इस सम्बन्ध में देखो मन्त्र १४७ ]
इस प्रकार मन्त्र का अभिप्रेत अर्थ है कि “इस ही हृदय में इन्द्रियां, ध्यान द्वारा, अन्तर्हित होती हैं, और इसी हृदय में कारीगर परमेश्वर भी अन्तर्हित है, यह योगीजन मानते हैं । अर्थात् इन्द्रियों को, और मन को, हृदय में अन्तर्हित कर, जब उसी हृदय में अन्तर्हित परमेश्वर का ध्यान ओ३म् के जप द्वारा किया जाता है, तब परमेश्वर का प्रत्यक्ष होता है, और इन्द्रियविजय भी होता हैं । ]