SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 914

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣च्छ꣡न्नश्व꣢꣯स्य꣣ य꣢꣫च्छिरः꣣ प꣡र्व꣢ते꣣ष्व꣡प꣢श्रितम् । त꣡द्वि꣢दच्छर्य꣣णा꣡व꣢ति ॥९१४॥

इ꣡च्छ꣢न् । अ꣡श्व꣢꣯स्य । यत् । शि꣡रः꣢꣯ । प꣡र्वते꣢꣯षु । अ꣡प꣢꣯श्रितम् । अ꣡प꣢꣯ । श्रि꣣तम् । त꣢त् । वि꣣दत् । शर्यणा꣡व꣢ति ॥९१४॥

Mantra without Swara
इच्छन्नश्वस्य यच्छिरः पर्वतेष्वपश्रितम् । तद्विदच्छर्यणावति ॥

इच्छन् । अश्वस्य । यत् । शिरः । पर्वतेषु । अपश्रितम् । अप । श्रितम् । तत् । विदत् । शर्यणावति ॥९१४॥

Samveda - Mantra Number : 914
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अश्वस्य) अश्व का (यत्) जो (शिरः) सिर (पर्वतेषु) पर्वतों में (अपश्रितम्) आश्रित है, उस सिर को (इच्छन्) चाहते हुए उपासक ने, (तत्) उसे (शर्यणावति) शर्यणावत् में (विदत्) प्राप्त किया ।
Footnote
[ अश्व पद द्वारा मन का वर्णन हुआ है । मन शक्तिशाली इसलिये इसे अश्व कहा है । श्वेताश्वतर उपनिषद् में मन को अश्व से उपमित किया है । यथाः-
प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत ।
दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ (२) ।
अश्वस्य शिरः—अश्व अर्थात् मन की शिरोभूत शक्ति है “बुद्धि” । मन को प्रेरणा मिलती है बुद्धि से । “मनसस्तु परा बुद्धिः” (कठ० १। ३। १०), अर्थात् मन से उत्कृष्ट शक्ति है “बुद्धि” । उपनिषदों के एक अन्य रूपक में शरीर को रथ, इन्द्रियों को अश्व, मन को प्रग्रह अर्थात् लगाम, और बुद्धि को सारथी कहा है (कठ० १। ३। ३) । इससे भी यही प्रतीत होता है कि मन की अपेक्षा बुद्धि शिरोभूत है । सारथी के हाथ में लगाम होती है । बुद्धि के हाथ में मनरूपी लगाम है । “बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च” (कठ० १। ३। ३) । इसलिये अश्व अर्थात् मन का सिर है बुद्धि, जिस द्वारा कि मन में प्रेरणा होती है । सभी प्रेरणाएं सिर से हो रही हैं । बुद्धि द्वारा प्रेरणाएं मिलती हैं इसलिये बुद्धि को मन का सिर कहा है ।
पर्वतेषुः—यह बुद्धि सात्विक बुद्धि है, राजसी और तामसी नहीं । इसकी प्राप्ति योगाभ्यास द्वारा होती है । योगाभ्यास के लिये एकान्त और प्रशान्त स्थान चाहिये । इस सात्विक बुद्धि प्रर्थात् सात्विक-घी की प्राप्ति के लिये एकान्त प्रशान्त स्थानों में से पर्वतीय-गुफा आदि अधिक उपयुक्त माने हैं । यथाः—“उपह्वरे गिरीणां सङ्गमे च नदीनाम् । घिया विप्रो अजायत ।”
इस मन्त्र में सात्विक-धी अर्थात् सात्विक बुद्धि की प्राप्ति के लिये “पर्वतीय उपह्वर” का वर्णन है । आपटे ने उपह्वर का अर्थ दिया है “A solitary or lonely place” । परन्तु उपह्वर शब्द में “ह्वर” का अर्थ है कुटिलता, अर्थात् टेड़ा-मेड़ा पन । ह्वृ कौटिल्ये । अतः पर्वतों के टेढ़े-मेढ़े स्थानों का वर्णन “उपह्वर” द्वारा मन्त्र में हुआ है।
अपाश्रितम्ः—अप + आश्रितम् । अर्थात् हट कर आश्रय पाना । सात्विक बुद्धि की प्राप्ति के लिये साँसारिक-धन्धों से हट कर पर्वतीय प्रशान्त स्थानों का श्राश्रय लेना होता है ।
शर्यणावतिः—पर्वत आदि स्थानों में अभ्यास करते हुए सात्विक-धी या सात्विक बुद्धि प्राप्त होती है । शर्यणावत् है हृदय । चित्त का स्थान है हृदय । यथाः—“हृदये चित्त संवित्” (योग० ३। ३४) अर्थात् हृदय में ध्यान लगाने पर चित्त के स्वरूप का ज्ञान होता है । बुद्धि एक अंश है “अन्तःकरण” का । मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार यह “अन्तःकरण चतुष्टय” एक स्थानी है । हृदय में इन चारों का स्थान है । वैदिक साहित्य में “शर्यणावत्” को “सरः” अर्थात् तालाब कहा है, यथा “शर्यणावश्च वै नाम कुरुक्षेत्रस्य जघनार्द्धे सरः स्यन्दते” अर्थात् शर्यणावत् तालाब है जोकि कुरुक्षेत्र के जघनार्ध में बहता है । कुरुक्षेत्र है कर्मक्षेत्र शरीर, जिसमें कि कर्मों के बीज बोये जाते हैं । इसके अर्ध भाग में ‘शर्यणावत् सरः’ है हृदय, जिसमें कि रक्त सदा प्रस्रवित हो रहा है । यह रक्त-सरः है, रक्त का तालाब है। हृदय की राग-द्वेष की ग्रन्थियां जब विशीर्ण हो जाती हैं तब योगी को मोक्ष मिलता है । विशीर्ण होने के कारण हृदय को शर्यणावत् कहा है। शर्यणा = विशीर्ण होना । विशुद्ध सात्विक बुद्धि-प्रकाश में जब परमेश्वर का दर्शन हो जाता है तब यह हृदय-सरः अर्थात् हृदय-तालाब विशीर्ण हो जाता है । यथा—
भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ (मुण्ड० २। २) । ]