SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 912

1871 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता꣢ स꣣म्रा꣡जा꣢ घृ꣣ता꣡सु꣢ती आदि꣣त्या꣡ दानु꣢꣯न꣣स्प꣡ती꣢ । स꣡चे꣢ते꣣ अ꣡न꣢वह्वरम् ॥९१२॥

ता꣢ । स꣣म्रा꣡जा꣢ । स꣣म् । रा꣡जा꣢꣯ । घृ꣣ता꣡सु꣢ती । घृ꣡त꣢ । आ꣣सुतीइ꣡ति꣢ । आ꣣दित्या꣢ । आ꣣ । दित्या꣢ । दा꣡नु꣢꣯नः । पती꣢꣯इ꣢ति꣢ । स꣡चे꣢꣯ते꣣इ꣡ति꣢ । अ꣡न꣢꣯वह्वरम् । अन् । अ꣣वह्वरम् ॥९१२॥

Mantra without Swara
ता सम्राजा घृतासुती आदित्या दानुनस्पती । सचेते अनवह्वरम् ॥

ता । सम्राजा । सम् । राजा । घृतासुती । घृत । आसुतीइति । आदित्या । आ । दित्या । दानुनः । पतीइति । सचेतेइति । अनवह्वरम् । अन् । अवह्वरम् ॥९१२॥

Samveda - Mantra Number : 912
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
परमेश्वर के (ता) वे दोनों रूप (सम्राजा) संसार में सम्यक्-राज्य कर रहे हैं। इन रूपों में मित्ररूप की अभिव्यक्ति तब होती है जब कि व्यक्तियों में (घृतासुती) ब्रह्मचर्य-रूपी-आसव की आदत पड़ी हुई हो । परमेश्वर के ये दोनों रूप (आदित्या) मानो आदित्य-स्वरूप हैं, जो कि आदित्य के सदृश संसार में चमक रहे हैं । (दानुनः पती) ये दोनों रूप सुख प्रदान के अधीश्वर हैं, और (अनवह्वरम्) अकुटिलता के साथ इन दोनों रूपों का (सचेते) सम्बन्ध हैं, अर्थात् इन दोनों रूपों के मेल से व्यक्ति कुटिलता आदि दुर्भावनाओं से रहित हो जाता है ।
Footnote
[ घृतासुती = घृत (वीर्य) + आसुति (आसव) । यथा,—“रेतः कृत्वाज्यं देवाः पुरुषमा विशन्” (अथर्व० ११। ८। २९) ! अर्थात् आज्य (घृत) रेतस् हैं, वीर्य है। ]