SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 911

1871 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
रा꣡जा꣢ना꣣व꣡न꣢भिद्रुहा ध्रु꣣वे꣡ सद꣢꣯स्युत्त꣣मे꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢स्थूण आशाते ॥९११॥

रा꣡जा꣢꣯नौ । अ꣡न꣢꣯भिद्रुहा । अन् । अ꣣भिद्रुहा । ध्रुवे꣢ । स꣡द꣢꣯सि । उ꣣त्तमे꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢स्थूणे । स꣣ह꣡स्र꣢ । स्थू꣣णे । आशातेइ꣡ति꣢ ॥९११॥

Mantra without Swara
राजानावनभिद्रुहा ध्रुवे सदस्युत्तमे । सहस्रस्थूण आशाते ॥

राजानौ । अनभिद्रुहा । अन् । अभिद्रुहा । ध्रुवे । सदसि । उत्तमे । सहस्रस्थूणे । सहस्र । स्थूणे । आशातेइति ॥९११॥

Samveda - Mantra Number : 911
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
मित्र और वरुण रूप अर्थात् ये दोनों रूप (राजानौ) मिलकर संसार पर राज्य कर रहे है, (अनभिद्रुष्टा) ये द्रोह से रहित हैं, (सहस्रस्थूणे) ये हजार खम्भों वाले (ध्रुवे) अचल (उत्तमे) सर्वोच्च (सदसि) स्थान में अर्थात् सहस्रार-चक्र में (प्राशाते) व्याप्त हो जाते हैं ।
Footnote
[ संसार में परमेश्वर के मित्ररूप और वरुणरूप का राज्य है । परमेश्वर सब के साथ स्नेह करता, श्रेष्ठ कर्मियों को सुख प्रदान करता, यह परमेश्वर के मित्ररूप का परिचायक है । दुष्कर्मियों को दण्ड देकर उन्हें दुर्माग से हटा कर सुमार्ग पर लाना, — परमेश्वर के मित्र-रूप तथा पापनिवारक वरुणरूप, —इन दोनों का परिचायक है । दुष्टों को दण्ड देना, — यह परमेश्वर की द्रोह-वृत्ति का परिचायक नहीं । न्यायाधीश दुष्टों को न्यायानुकूल जो दण्डविधान करता है वह न्यायाधीश की द्रोह-वृत्ति का परिणाम नहीं होता । अपितु इस दण्डविधान में दण्डित व्यक्ति के प्रति स्नेह भावना अन्तर्हित रहती है । सहस्रस्थूण-स्थान सहस्रार-चक्र का सूचक है । इसे सहस्रदल कमल भी कहते हैं । यह अन्य सब चक्रों में से सर्वोच्च चक्र है । इसका स्थान मस्तिष्क है । इसके ऊपर कोई अन्य चक्र नहीं । इस चक्र में जब योगी का चित्त ध्रुवरूप में, स्थिर रूप में, स्थित हो जाता है, तब योगी के योग की यह अन्तिमावस्था हो जाती है। योगी तब जीवन्मुक्त हो जाता है तब योगी मित्र और वरुण रूप होकर प्रजोपकार में रत हो जाता है । वह मैत्रीभावना से प्रजाजनों को पापमार्ग से हटाने में यत्नवान् हो जाता है ]