SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 9

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्वा꣡म꣢ग्ने꣣ पु꣡ष्क꣢रा꣣द꣡ध्यथ꣢꣯र्वा꣣ नि꣡र꣢मन्थत । मू꣣र्ध्नो꣡ विश्व꣢꣯स्य वा꣣घ꣡तः꣢ ॥९॥

त्वा꣢म् । अ꣣ग्ने । पु꣡ष्क꣢꣯रात् । अ꣡धि꣢꣯ । अ꣡थ꣢꣯र्वा । निः । अ꣣मन्थत । मूर्ध्नः꣢ । वि꣡श्व꣢꣯स्य । वा꣣घ꣡तः꣢ ॥९॥

Mantra without Swara
त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत । मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः ॥

त्वाम् । अग्ने । पुष्करात् । अधि । अथर्वा । निः । अमन्थत । मूर्ध्नः । विश्वस्य । वाघतः ॥९॥

Samveda - Mantra Number : 9
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे प्रकाशस्वरूप नेता (अथर्वा) स्थिर चित्त वृत्ति वाले उपासक ने (पुष्करात् अधि) शरीर की पुष्टि करने वाले हृदय से आपको (अमन्थत) मथा है, (निर्) और मथ कर आप को प्रकट किया है । तथा (विश्वस्य वाघतः) समग्र शरीर का वहन करने वाले (मूर्ध्नः) मूर्धा स्थान से भी मथ कर आप को प्रकट किया है ।
Footnote
[अथर्वा =थर्वतिः चरतिकर्मा, तत्प्रतिषेधः (निरु० ११।२।१९) । पुष्कर = पुष्टि + कर । अमन्थत = “स्वदेहमरणि कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्यान निर्मथनाभ्यासाद् देव पश्येन्निगूढवत्” (श्वेता० २।११) । अर्थात् अपने देह को अवरारणि अर्थात् निचली अरणि-वृक्ष की लकड़ी करके, और प्रणव अर्थात् ओ३म् को उत्तरारणि अर्थात् अरणिवृक्ष की ऊपर की लकड़ी करके, तथा ध्यानाभ्यासरूपी मथन द्वारा, हृदय में छिपे अग्नि देव का, अर्थात् परमात्मा का दर्शन करे । मूर्ध्नः = मूर्घज्योतिषि सिद्धदर्शनम् (योग ३।३२) ]
१. अरणि A piece of wood (of samitree) used for kindling the sacred fire by attrition, the two pieces of wood used in kindling the sacred fire (आपटे) ।