SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 870

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ ब्रह्मी꣢꣯रनूषत य꣣ह्वी꣢रृ꣣त꣡स्य꣢ मा꣣त꣡रः꣢ । म꣣र्ज꣡य꣢न्ती꣣र्दिवः꣡ शिशु꣢꣯म् ॥८७०॥

अ꣣भि꣢ । ब्र꣡ह्मीः꣢꣯ । अ꣣नूषत । यह्वीः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । मा꣣त꣡रः꣢ । म꣣र्ज꣡य꣢न्तीः । दि꣣वः꣢ । शि꣡शु꣢꣯म् ॥८७०॥

Mantra without Swara
अभि ब्रह्मीरनूषत यह्वीरृतस्य मातरः । मर्जयन्तीर्दिवः शिशुम् ॥

अभि । ब्रह्मीः । अनूषत । यह्वीः । ऋतस्य । मातरः । मर्जयन्तीः । दिवः । शिशुम् ॥८७०॥

Samveda - Mantra Number : 870
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(ब्राह्मीः) ब्रह्म द्वारा प्रोक्त तीन (८६९) (यह्वीः) वैदिक महावाणियां, (ऋतस्य) सत्यधर्म की (मातरः) जन्मदात्री हैं। ये (मर्जयन्तीः) उपासकों को शुद्ध करती हैं, और (शिशुम्) अपनी शैशवावस्था में प्रकट हुए (दिवः) द्युतिसम्पन्न परमेश्वर की (अनूषत) स्तुतियां करती हैं ।
Footnote
[ शिशुम् = परमेश्वर के प्रथम प्रकट प्रकाश को शैशवावस्था का प्रकाश कहा है ]