SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 849

1871 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
क꣣वी꣡ नो꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा तुविजा꣣ता꣡ उ꣢रु꣣क्ष꣡या꣢ । द꣡क्षं꣢ दधाते अ꣣प꣡स꣢म् ॥८४९॥

क꣣वी꣡इति꣢ । नः꣣ । मित्रा꣢ । मि꣣ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । तु꣣विजातौ꣢ । तु꣣वि । जातौ꣢ । उ꣣रु꣡क्ष꣢या । उ꣣रु । क्ष꣡या꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । द꣣धातेइ꣡ति꣢ । अ꣣प꣡स꣢म् ॥८४९॥

Mantra without Swara
कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥

कवीइति । नः । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । तुविजातौ । तुवि । जातौ । उरुक्षया । उरु । क्षया । दक्षम् । दधातेइति । अपसम् ॥८४९॥

Samveda - Mantra Number : 849
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
परमेश्वर के (मित्रावरुणा) मित्र और वरुण - दोनों रूप (कवी) कवि हैं, इन दोनों रूपों का वर्णन वेदकाव्य में हुआ है । अतः इन दोनों रूपों का सम्बन्ध परमेश्वर की कवित्व शक्ति के साथ है । अतः परमेश्वर के ये दोनों रूप (नः) हम प्रजा जनों में (दक्षम्) बल, बुद्धि, चातुर्य और (अपसम्) सत्कर्म (दधाते) स्थापित करते हैं । परमेश्वर के शासनकर्म में इन दोनों रूपों की (तुविजाता) बहुत प्रसिद्धि है, परमेश्वर के शासन में इन दोनों रूपों का (उरुक्षया) सर्वत्र निवास है ।
Footnote
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