SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 848

1871 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ꣣ते꣡न꣢ मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्र꣡तुं꣢ बृ꣣ह꣡न्त꣢माशाथे ॥८४८॥

ऋ꣣ते꣡न꣢ । मि꣣त्रा । मि । त्रा । वरुणौ । ऋतावृधौ । ऋत । वृधौ । ऋतस्पृशा । ऋत । स्पृशा । क्र꣡तु꣢꣯म् । बृ꣣ह꣡न्त꣢म् । आ꣣शाथेइ꣡ति꣢ ॥८४८॥

Mantra without Swara
ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥

ऋतेन । मित्रा । मि । त्रा । वरुणौ । ऋतावृधौ । ऋत । वृधौ । ऋतस्पृशा । ऋत । स्पृशा । क्रतुम् । बृहन्तम् । आशाथेइति ॥८४८॥

Samveda - Mantra Number : 848
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
परमेश्वर के (मित्रावरुणौ) मित्र और वरुण-रूप, परमेश्वर के (बृहन्तंक्रतुम्) महान् शासनकर्म में (आशाथे) व्याप्त हैं । परमेश्वर के ये दोनों रूप मिल कर (ऋतेन्) सत्यनियमों द्वारा (ऋतावृधौ) सत्य का वर्धन करते हैं, (ऋतस्पृशा) इन दोनों रूपों के साथ सत्य का सम्बन्ध है ।
Footnote
[ अभिप्राय यह है कि शासनकार्य में मैत्रीभावना पूर्वक दण्ड प्रयोग करना चाहिए । शासन में सत्य का परित्याग नहीं होना चाहिए । परन्तु प्रजा को सत्यमार्ग पर चलाने के लिए शासनों के लिए मित्ररूप और दण्डघररूप इन दोनों रूपों में समुचित समन्वय की अपेक्षा होनी चाहिए । अकेले-अकेले इन दो रूपों के साथ सच्चाई का पूरा सम्बन्ध नहीं होता, अपितु सच्चाई का आंशिक सम्बन्ध ही होता है । इस भाव को “ऋतस्पृशौ” द्वारा सूचित किया है । इन दोनों रूपों के साथ सच्चाई का पूर्ण सम्बन्ध तभी होता है जब कि इन दोनों रूपों को मिलाकर शासनकार्य किया जाय ]