SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 814

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म꣡त्स्वा꣢ सुशिप्रिन्हरिव꣣स्त꣡मी꣢महे꣣ त्व꣡या꣢ भूषन्ति वे꣣ध꣡सः꣢ । त꣢व꣣ श्र꣡वा꣢ꣳस्युप꣣मा꣡न्यु꣢क्थ्य सु꣣ते꣡ष्वि꣢न्द्र गिर्वणः ॥८१४॥

म꣡त्स्व꣢꣯ । सु꣣शिप्रिन् । सु । शिप्रिन् । हरिवः । त꣢म् । ई꣣महे । त्व꣡या꣢꣯ । भू꣣षन्ति । वे꣡धसः꣢ । त꣡व꣢꣯ । श्र꣡वा꣢꣯ꣳसि । उ꣣प꣡मानि꣡ । उ꣣प । मा꣡नि꣢꣯ । उ꣡क्थ्य । सुते꣡षु꣢ । इ꣢न्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः ॥८१४॥

Mantra without Swara
मत्स्वा सुशिप्रिन्हरिवस्तमीमहे त्वया भूषन्ति वेधसः । तव श्रवाꣳस्युपमान्युक्थ्य सुतेष्विन्द्र गिर्वणः ॥

मत्स्व । सुशिप्रिन् । सु । शिप्रिन् । हरिवः । तम् । ईमहे । त्वया । भूषन्ति । वेधसः । तव । श्रवाꣳसि । उपमानि । उप । मानि । उक्थ्य । सुतेषु । इन्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः ॥८१४॥

Samveda - Mantra Number : 814
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सुशिप्रिन्) हे शान्त तथा परिपूर्ण !, (हरिवः) हे विषयों में हरण करने वाली इन्द्रियों के स्वामी !, (उक्थ्य) हे स्तुत्य ! (गिर्वणः) हे वेदवाणियों द्वारा भजनीय (इन्द्र) परमेश्वर; (मत्स्व) आप प्रसन्न हूजिये । (सुतेषु) भक्तिरसों के उत्पन्न हो जाने पर (तम्) उस परमेश्वर से ही (ईमहे) हम प्रार्थनाएँ करते हैं । हे प्रभो ! (त्वया) आपकी कृपा से (वेधसः) आपके सेवक (भूषन्ति) शोभा पाते हैं, और (तव) आपके ही (अवांसि) यश (उपमानि) उपमाओं के योग्य हैं ।
Footnote
[ शिप्रिन = शि (Calm + प्रा (पूरणे) +इन् । वेधसः = परिचारकाः (सायण) ]
[ सुशिप्रिन् = सु + शि (calm, आपटे) + प्रा (पूरणे) + इन् । निरुक्तकार ने “सृप्र” पद की व्याख्या के पश्चात् “सुशिप्र” पद की व्याख्या में लिखा है कि “सुशिप्रमेतेन व्याख्यातम्”, अर्थात् “शिप्र” पद की वही व्याख्या है जो कि “सृप्र” पद की हुई है। “सृप्र” पद की व्याख्या में लिखा है कि “सूत्रः सर्पणात्”, अर्थात् जो सर्पण करते हैं उन्हें “सृप्र” कहते हैं । अतः “शिप्र” का अर्थ भी होगा “सर्पण करने वाले”। पृथिवी, सूर्य, चन्द्र, तारागण सभी सर्पण कर रहे हैं । अतः इन्हें “शिप्र” कहा जा सकता है । इनका स्वामी होने से परमेश्वर “शिप्री” कहा जा सकता है।
[२] “शिप्रे” द्विवचनान्त पद की व्याख्या में निरुक्तकार कहते हैं कि “शिप्रे हुनू नासिके वा” (६। ४। १६), अर्थात् दो जबाड़े या दो नासिकाछिद्र। इस अर्थ में मन्त्र में उपमा-वाची पद “इव, यथा, न” आदि लुप्त समझ कर अर्थ होगा सुन्दर मुख वाले व्यक्ति के सदृश सुन्दर । परमेश्वर को “सत्यं शिवं सुन्दरम्” कहा भी है ।
[३] “शिप्र” शब्द “शिप् + र” द्वारा भी समझा जा सकता है । शिप्-और-शिपि में सारूप्य प्रतीत होता है । शिपि का अर्थ निरुक्तकार ने “रश्मयः” भी किया है (५। २। ८) । अतः “सुशिप्र” का अर्थ हुआ “उत्तम रश्मियों वाला”, अर्थात् शोभन प्रकाश वाला, या सूर्यादि रश्मियों वाले लोकों का स्वामी । ]