SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 798

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣ वा꣡जे꣢षु नोऽव स꣣ह꣡स्र꣢प्रधनेषु च । उ꣣ग्र꣢ उ꣣ग्रा꣡भि꣢रू꣣ति꣡भिः꣢ ॥७९८॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । वा꣡जे꣢꣯षु । नः꣣ । अव । सह꣡स्र꣢प्रधनेषु । स꣣ह꣡स्र꣢ । प्र꣣धनेषु । च । उ꣢ग्रः । उ꣣ग्रा꣡भिः꣢ । ऊ꣣ति꣡भिः꣢ ॥७९८॥

Mantra without Swara
इन्द्र वाजेषु नोऽव सहस्रप्रधनेषु च । उग्र उग्राभिरूतिभिः ॥

इन्द्र । वाजेषु । नः । अव । सहस्रप्रधनेषु । सहस्र । प्रधनेषु । च । उग्रः । उग्राभिः । ऊतिभिः ॥७९८॥

Samveda - Mantra Number : 798
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमेश्वर ! (उग्रः) आप रुद्ररूप होकर, (उग्राभिः ऊतिभिः) अपनी उग्र रक्षाओं द्वारा, (वाजेषु) आसुर-शक्तियों के साथ युद्ध करने के लिये (वाजेषु) शक्तियों की प्राप्ति के निमित्त (नः) हमारी (अव) रक्षा कीजिये । (च) और जब (सहस्रप्रधनेषु) ये युद्ध जीवन में हजारों बार भी आएँ, तब भी इन युद्धों में (नः अव) आप हमारी रक्षा कीजिये ।
Footnote
[ सहस्रप्रधनेषुः सहस्र का अर्थ है “हजार”, और प्रधन का अर्थ हैं “प्रभूतधन” । प्रभूतधन कमाने और धन का स्वार्थ प्रयोग = लोभवृत्ति का परिणाम है । यह लोभवृत्ति आसुरी वृत्ति है । परोपकार, त्याग, तथा सन्तोष, —ये दैवीवृत्तियां हैं । इन आसुरी तथा देवी वृत्तियों में संग्राम दिन-रात हो रहा है । प्रभु से शक्ति की याचना की गई है कि हम दैवी वृत्तियों द्वारा आसुरी वृत्तियों पर विजय पा सकें । यह आध्यात्मिक देवासुर संग्राम है ]