SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 794

1871 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ꣣ते꣢न꣣ या꣡वृ꣢ता꣣वृ꣡धा꣢वृ꣣त꣢स्य꣣ ज्यो꣡ति꣢ष꣣स्प꣡ती꣢ । ता꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा हुवे ॥७९४॥

ऋते꣡न꣢ । यौ । ऋ꣣तावृ꣡धौ꣢ । ऋ꣣त । वृ꣡धौ꣢꣯ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । ज्यो꣡ति꣢꣯षः । पती꣢꣯इ꣡ति꣢ । ता । मि꣡त्रा꣢ । मि꣡ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । हु꣣वे ॥७९४॥

Mantra without Swara
ऋतेन यावृतावृधावृतस्य ज्योतिषस्पती । ता मित्रावरुणा हुवे ॥

ऋतेन । यौ । ऋतावृधौ । ऋत । वृधौ । ऋतस्य । ज्योतिषः । पतीइति । ता । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । हुवे ॥७९४॥

Samveda - Mantra Number : 794
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(यौ मित्रावरुणा) परमेश्वर के जो मित्र और वरुण स्वरूप, (ऋतेन) सत्यमार्ग के उपदेश द्वारा, (ऋतावृधौ) सत्य के वर्धक हैं, और (ऋतस्य ज्योतिषापती) सत्यरूपी ज्योति के स्वामी हैं, (ता) उन दोनों स्वरूपों का (हुवे) मैं आह्वान करता हूं ।
Footnote
[ मित्र स्वरूप स्नेह का सूचक है, और वरुण प्रर्थात् पाप निवारक स्वरूप दण्ड का सूचक है । अधिक स्नेह से सन्तान बिगड़ती, और अधिक दण्ड से सन्तान विमुख हो जाती है । अतः स्नेहभावना से दण्ड का प्रयोग, सन्तानों को सुधारता है। ]