SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 761

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ शिक्षापत꣣स्थु꣡षो꣢ भि꣣य꣢स꣣मा꣡ धे꣢हि꣣ श꣡त्र꣢वे । प꣡व꣢मान वि꣣दा꣢ र꣣यि꣢म् ॥७६१॥

उ꣡प꣢꣯ । शि꣣क्ष । अपतस्थु꣡षः꣢ । अ꣣प । तस्थु꣡षः꣢ । भि꣣य꣡स꣢म् । आ । धे꣣हि । श꣡त्र꣢꣯वे । प꣡व꣢꣯मान । वि꣣दाः꣢ । र꣣यि꣢म् ॥७६१॥

Mantra without Swara
उप शिक्षापतस्थुषो भियसमा धेहि शत्रवे । पवमान विदा रयिम् ॥

उप । शिक्ष । अपतस्थुषः । अप । तस्थुषः । भियसम् । आ । धेहि । शत्रवे । पवमान । विदाः । रयिम् ॥७६१॥

Samveda - Mantra Number : 761
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे अभिषिक्त उपासक ! (अप तस्थुषः) मार्गभ्रष्ट लोग जब तेरी शरण में आवें तो उन्हें उपासना मार्ग में (शिक्ष) शिक्षित किया कर । (शत्रवे) और जो उपासना-मार्ग के शत्रु हैं उन्हें (भियसम् आधेहि) भय प्रदर्शन किया कर, अर्थात् उपासना-मार्ग को स्वीकार न करने पर जो जन्म-मरण आदि के भय हैं उन्हें दर्शाया कर । (पवमान) हे शरणागतों को पवित्र करने वाले ! इस प्रकार उन्हें (रयिम्) उपासना-धन (विदाः) दिया कर ।
Footnote
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