SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 756

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣य꣡ꣳ सूर्य꣢꣯ इवोप꣣दृ꣢ग꣣य꣡ꣳ सरा꣢꣯ꣳसि धावति । स꣣प्त꣢ प्र꣣व꣢त꣣ आ꣡ दिव꣢꣯म् ॥७५६॥

अ꣣य꣢म् । सू꣡र्यः꣢꣯ । इ꣣व । उपदृ꣢क् । उ꣣प । दृ꣢क् । अ꣣य꣢म् । स꣡रा꣢꣯ꣳसि । धा꣣वति । स꣣प्त꣢ । प्र꣣व꣡तः꣢ । आ । दि꣡व꣢꣯म् ॥७५६॥

Mantra without Swara
अयꣳ सूर्य इवोपदृगयꣳ सराꣳसि धावति । सप्त प्रवत आ दिवम् ॥

अयम् । सूर्यः । इव । उपदृक् । उप । दृक् । अयम् । सराꣳसि । धावति । सप्त । प्रवतः । आ । दिवम् ॥७५६॥

Samveda - Mantra Number : 756
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अयम्) यह परमेश्वर (सूर्य इव) सूर्य के सदृश (उपदृक्) उपासना में दृष्टिगोचर होता है; यह परमेश्वर भक्तिरस के पान के लिये (सरांसि) उपासकों के हृदय-सरोवरों की ओर (धावति) दौड़ लगाता है, (सप्त प्रवतः) सात प्रवाहों तथा (दिवम्) मूर्धा को (आ धावति) पूर्णरूप में शुद्ध कर देता है ।
Footnote
[ धावति = गति और शुद्धि । सप्त प्रवतः = ५ ज्ञानेन्द्रियां, मन और बुद्धि । दिवम् = मस्तिष्क, जो कि इन सात प्रवाहों का उद्गमस्थान है ]