SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 742

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ घा꣢ नो꣣ यो꣢ग꣣ आ꣡ भु꣢व꣣त्स꣢ रा꣣ये꣡ स पुर꣢꣯न्ध्या । ग꣢म꣣द्वा꣡जे꣢भि꣣रा꣡ स नः꣢꣯ ॥७४२॥

सः । घ꣣ । नः । यो꣡गे꣢꣯ । आ । भु꣣वत् । सः꣢ । रा꣣ये꣢ । सः । पु꣡र꣢꣯न्ध्या । पु꣡र꣢꣯म् । ध्या꣣ । ग꣡म꣢꣯त् । वा꣡जे꣢꣯भिः । आ । सः । नः꣣ ॥७४२॥

Mantra without Swara
स घा नो योग आ भुवत्स राये स पुरन्ध्या । गमद्वाजेभिरा स नः ॥

सः । घ । नः । योगे । आ । भुवत् । सः । राये । सः । पुरन्ध्या । पुरम् । ध्या । गमत् । वाजेभिः । आ । सः । नः ॥७४२॥

Samveda - Mantra Number : 742
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सः) वह परमेश्वर (घ) निश्चय से (नः) हमारी (योगे) योगसाधनों में (आ भुवत्) हमारा सहायक होता है; (सः) वह (राये) आध्यात्मिक सम्पत्तियों अर्थात् विभूतियों की प्राप्ति में हमारा सहायक हुआ है; (सः) वह (पुरन्ध्या) ध्यानजनित प्रज्ञालोकों की प्राप्ति में हमारा सहायक हुआ है; (सः) वह (वाजेभिः) बलों का प्रदान करता हुआ (नः) हमें (आ गमत्) प्राप्त होता है ।
Footnote
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