SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 739

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣡ ते꣢ अश्नोतु कु꣣क्ष्योः꣢꣫ प्रेन्द्र꣣ ब्र꣡ह्म꣢णा꣣ शि꣡रः꣢ । प्र꣢ बा꣣हू꣡ शू꣢र꣣ रा꣡ध꣢सा ॥७३९॥

प्र꣢ । ते꣣ । अश्नोतु । कुक्ष्योः꣢ । प्र । इ꣣न्द्र । ब्र꣡ह्म꣢꣯णा । शि꣡रः꣢꣯ । प्र । बा꣣हू꣡इति꣢ । शू꣣र । रा꣡ध꣢꣯सा ॥७३९॥

Mantra without Swara
प्र ते अश्नोतु कुक्ष्योः प्रेन्द्र ब्रह्मणा शिरः । प्र बाहू शूर राधसा ॥

प्र । ते । अश्नोतु । कुक्ष्योः । प्र । इन्द्र । ब्रह्मणा । शिरः । प्र । बाहूइति । शूर । राधसा ॥७३९॥

Samveda - Mantra Number : 739
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे उपासक ! (राधसा) आराधना के द्वारा यह भक्तिरस (ते) तेरी (कुक्ष्योः) दो कोखों के मध्य में वर्तमान तेरे हृदय में, तथा श्वास-प्रश्वास में, (प्र अश्नोतु) व्याप्त हो जाय। (इन्द्र) हे जीवात्मन् ! (ब्रह्मणा) ब्रह्म की कृपा से भक्तिरस तेरे (शिरः) विचारों में (प्र) व्याप्त हो जाय। (शूर) पापों के साथ लड़ने में हे शूरवीर उपासक ! भक्तिरस (बाहू) तेरी बाहुओं में (प्र) व्याप्त हो जाय, अर्थात् यह भक्तिरस तेरे अङ्ग-अङ्ग में व्याप्त हो जाय ।
Footnote
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