SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 736

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣢ ते꣣ य꣢वं꣣ य꣢था꣣ गो꣡भिः꣢ स्वा꣣दु꣡म꣢कर्म श्री꣣ण꣡न्तः꣢ । इ꣡न्द्र꣢ त्वा꣣स्मिं꣡त्स꣢ध꣣मा꣡दे꣢ ॥७३६॥

तम् । ते꣣ । य꣡व꣢꣯म् । य꣡था꣢꣯ । गो꣡भिः꣢꣯ । स्वा꣣दु꣢म् । अ꣣कर्म । श्रीण꣡न्तः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । त्वा꣣ । अस्मि꣣न् । स꣣धमा꣡दे꣢ । स꣣ध । मा꣡दे꣢꣯ ॥७३६॥

Mantra without Swara
तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमकर्म श्रीणन्तः । इन्द्र त्वास्मिंत्सधमादे ॥

तम् । ते । यवम् । यथा । गोभिः । स्वादुम् । अकर्म । श्रीणन्तः । इन्द्र । त्वा । अस्मिन् । सधमादे । सध । मादे ॥७३६॥

Samveda - Mantra Number : 736
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे उपासक ! (तम्) उस तुझ को, (ते) उन उपासक नेताओं ने, (स्वादुम्) स्वानुकूल रूप से ग्रहण योग्य (अकर्म) कर दिया है, (यथा) जैसे कि (गोभिः) गोदुग्ध के साथ (यवम्) जौं के दलिये को (श्रीणन्तः) पकाते हुए गृहस्थी, जौ के दलिये को, स्वादु अर्थात् स्वानुकूल रूप में कर लेते हैं । (इन्द्र) हे परमेश्वर ! (अस्मिन् सधमादे) इस पारस्परिक प्रसन्नता में हम (त्वा) आप को भक्तिरस भेंट करते हैं ।
Footnote
[ सधमादेः = मन्त्र में उपासक तथा परमेश्वर की पारस्परिक प्रसन्नता का वर्णन है । उपासक तो भक्तिरस भेंट करता है, और परमेश्वर उपासक को आनन्दरस प्रदान करता है । इस आदान-प्रदान में इन दोनों की पारस्परिक प्रसन्नता होती है ]