SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 711

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
वा꣡र्ण त्वा꣢꣯ य꣣व्या꣢भि꣣र्व꣡र्ध꣢न्ति शूर꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि । वा꣣वृध्वा꣡ꣳसं꣢ चिदद्रिवो दि꣣वे꣡दि꣢वे ॥७११॥

वाः । न । त्वा꣣ । यव्या꣡भिः꣢ । व꣡र्द्ध꣢꣯न्ति । शू꣣र । ब्र꣡ह्मा꣢꣯णि । वा꣣वृध्वा꣡ꣳस꣢म् । चि꣣त् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । दि꣡वेदि꣢वे । दि꣣वे꣢ । दि꣣वे ॥७११॥

Mantra without Swara
वार्ण त्वा यव्याभिर्वर्धन्ति शूर ब्रह्माणि । वावृध्वाꣳसं चिदद्रिवो दिवेदिवे ॥

वाः । न । त्वा । यव्याभिः । वर्द्धन्ति । शूर । ब्रह्माणि । वावृध्वाꣳसम् । चित् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । दिवेदिवे । दिवे । दिवे ॥७११॥

Samveda - Mantra Number : 711
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(शूर) हे शक्तिशाली ! तथा (अद्रिवः) न विदीर्ण होने वाले अमर परमेश्वर ! (ब्रह्माणि) ब्रह्मप्रतिपादक वेदमन्त्र, (दिवे दिवे) प्रतिदिन, (वावृध्वांसम्) सदा बढ़े हुए आप को (वर्धन्ति) बढ़ाते हैं, (न) जैसे कि (यव्याभिः) जौ आदि को उपजाने वाली तथा समुद्र के साथ संगम करने वाली नदियों के द्वारा, सदा बढ़े (वाः) समुद्र के जल को, प्राकृतिक शक्तियां बढ़ाती हैं ।
Footnote
[ यव्याः = नदी (निघं० १। १३) नदी जल खेतों में जो आदि उपजाता है, तथा महानदियां समुद्र में जा मिलती हैं, (यु मिश्रणे) । अभिप्राय यह कि जैसे सदा बढे समुद्र को नदियां नहीं बढ़ा सकतीं, परन्तु फिर भी अपने उद्गम स्थान समुद्र की ओर वे प्रयाण करती हैं, वैसे सदा बढे परमेश्वर को वेदवाणियां नहीं बढ़ा सकतीं, परन्तु वेदवाणियां परमेश्वर के गुणों का वर्णन करती हुई अपने उद्गम स्थान परमेश्वर की ओर ही प्रयाण कर रही हैं । ]