SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 710

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- ककुबुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣢धा꣣꣬ ही꣢꣯न्द्र गिर्वण꣣ उ꣡प꣢ त्वा꣣ का꣡म꣢ ई꣣म꣡हे꣢ ससृ꣣ग्म꣡हे꣢ । उ꣣दे꣢व꣣ ग्म꣡न्त꣢ उ꣣द꣡भिः꣢ ॥७१०॥

अ꣡ध꣢꣯ । हि । इ꣣न्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः । उ꣡प꣢꣯ । त्वा꣣ । का꣡मे꣢꣯ । ई꣣म꣡हे꣢ । स꣣सृग्म꣡हे꣢ । उ꣣दा꣢ । इ꣣व । ग्म꣡न्तः꣢꣯ । उ꣣द꣡भिः꣢ ॥७१०॥

Mantra without Swara
अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा काम ईमहे ससृग्महे । उदेव ग्मन्त उदभिः ॥

अध । हि । इन्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः । उप । त्वा । कामे । ईमहे । ससृग्महे । उदा । इव । ग्मन्तः । उदभिः ॥७१०॥

Samveda - Mantra Number : 710
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(गिर्वणः) हे वेदवाणियों द्वारा भजने योग्य (इन्द्र) परमेश्वर ! (अधा) अब हम में (हि) निश्चित रूप में (त्वा) आप के प्रति (कामः) कामना जागरित हुई है। इसलिये (त्वा) आप को हम (उप ईमहे) प्राप्त होते हैं । आप के साथ हम अपना (ससृग्महे) संसर्ग करते हैं, (इव) जैसे कि जलचर प्राणी (उदभिः) जलों के साथ (उद् आग्मन्तः) सदा संसर्ग करते हैं ।
Footnote
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