SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 670

1871 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी जरि꣣तुः꣡ सचा꣢꣯ य꣣ज्ञो꣡ जि꣢गाति꣣ चे꣡त꣢नः । अ꣣या꣡ पा꣢तमि꣣म꣢ꣳ सु꣣त꣢म् ॥६७०॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । ज꣢रितुः꣣ । स꣡चा꣢꣯ । य꣣ज्ञः꣢ । जि꣢गाति । चे꣡तनः꣢꣯ । अ꣣या꣢ । पा꣣तम् । इम꣢म् । सु꣣त꣢म् ॥६७०॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः । अया पातमिमꣳ सुतम् ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । जरितुः । सचा । यज्ञः । जिगाति । चेतनः । अया । पातम् । इमम् । सुतम् ॥६७०॥

Samveda - Mantra Number : 670
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्राग्नी) परमैश्वर्यवान् तथा सर्वाग्रणी या सत्पथ पर ले चलने वाला प्रभु, (अया) इस योगक्रिया द्वारा (सुतम्) निष्पादित (इमम्) इस भक्तिरस को (पातम्) स्वीकार करे। (जरितुः) स्तोता का (यज्ञः) उपासना-यज्ञ, जोकि (सचा) सदा उस के साथ रहता है, और (चेतनः) जो उसे सचेत किये रहता है, वह (जिगाति) आप को समर्पणरूप में प्राप्त होता है ।
Footnote
[ परमैश्वर्यवत्ता तथा सर्वाग्रणीत्व रूप, इन दो गुणों द्वारा व्यक्तिभेद मान कर मन्त्र में द्विवचन का प्रयोग हुआ है । इससे मन्त्र में दो देवों का वर्णन न समझ कर, इन दो गुणों वाले एक प्रभु का ही वर्णन समझना चाहिये ]