SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 669

1871 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ आ꣡ ग꣢तꣳ सु꣣तं꣢ गी꣣र्भि꣢꣫र्न꣣भो व꣡रे꣢ण्यम् । अ꣣स्य꣡ पा꣢तं धि꣣ये꣢षि꣣ता꣢ ॥६६९॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । आ । ग꣣तम् । सुत꣢म् । गी꣣र्भिः꣢ । न꣡भः꣢꣯ । व꣡रेण्य꣢꣯म् । अ꣣स्य꣢ । पा꣣तम् । धिया꣢ । इ꣣षि꣢ता ॥६६९॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी आ गतꣳ सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम् । अस्य पातं धियेषिता ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । आ । गतम् । सुतम् । गीर्भिः । नभः । वरेण्यम् । अस्य । पातम् । धिया । इषिता ॥६६९॥

Samveda - Mantra Number : 669
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
परमेश्वर के (इन्द्राग्नी) परमैश्वर्यवान और सर्वाग्रणी रूप, (धियेषिता) हमारी ध्यानशक्ति द्वारा प्रेरित होकर, (गीर्भिः) वैदिक वाणियों द्वारा (सुतम्) निष्पादित भक्तिरस की ओर (आ गतम्) आवें, तथा (वरेण्यं नमः) श्रेष्ठ हृदयाकाश में आ प्रकट हों, (अस्य) इस भक्तिरस को (पातम्) स्वीकार करें, और इस की रक्षा करें ।
Footnote
[ अभिप्राय यह कि हमें परमेश्वर के इन दोनों स्वरूपों का प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाय, इन स्वरूपों का ज्ञान केवल स्वाध्याय तथा अनुमान पर ही आश्रित न हो ]