SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 665

1871 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गृ꣣णाना꣢ ज꣣म꣡द꣢ग्निना꣣ यो꣡ना꣢वृ꣣त꣡स्य꣢ सीदतम् । पा꣣त꣡ꣳ सोम꣢꣯मृतावृधा ॥६६५॥

गृणाना꣢ । ज꣣म꣡द꣢ग्निना । ज꣣म꣢त् । अ꣣ग्निना । यो꣡नौ꣢꣯ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । सी꣣दतम् । पात꣢म् । सो꣡म꣢꣯म् । ऋ꣣तावृधा । ऋत । वृधा ॥६६५॥

Mantra without Swara
गृणाना जमदग्निना योनावृतस्य सीदतम् । पातꣳ सोममृतावृधा ॥

गृणाना । जमदग्निना । जमत् । अग्निना । योनौ । ऋतस्य । सीदतम् । पातम् । सोमम् । ऋतावृधा । ऋत । वृधा ॥६६५॥

Samveda - Mantra Number : 665
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(जमदग्निना) जिस ने परमात्मज्योति को प्रकट कर लिया है उस द्वारा (गृणाना) प्रशंसित मित्र और वरुण स्वरूप, (ऋतस्य) सच्चाई से भरे (योनौ) उपासक के हृदय-गृह में (सीदतम्) निवास कर लेते हैं, और उपासक को (ऋतावृधा) उस के सत्यमार्ग पर बढ़ाते रहते हैं । परमात्मा के ये दोनों स्वरूप (सोमम्) उपासक के भक्तिरस की (पातम्) सुरक्षा करते रहते हैं ।
Footnote
[ जमदग्नयः = प्रज्वलिताग्नयः (निरु० ७। ७। २५) ]