SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 664

1871 Mantra
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣रुश꣡ꣳसा꣢ नमो꣣वृ꣡धा꣢ म꣣ह्ना꣡ दक्ष꣢꣯स्य राजथः । द्रा꣣घि꣢ष्ठाभिः शुचिव्रता ॥६६४॥

उ꣣रुश꣡ꣳसा꣢ । उ꣣रु । श꣡ꣳसा꣢꣯ । न꣣मोवृ꣡धा꣢ । न꣣मः । वृ꣡धा꣢꣯ । म꣣हा꣢ । द꣡क्षस्य꣢꣯ । रा꣣जथः । द्रा꣡घि꣢꣫ष्ठाभिः । शुचिव्रता । शुचि । व्रता ॥६६४॥

Mantra without Swara
उरुशꣳसा नमोवृधा मह्ना दक्षस्य राजथः । द्राघिष्ठाभिः शुचिव्रता ॥

उरुशꣳसा । उरु । शꣳसा । नमोवृधा । नमः । वृधा । महा । दक्षस्य । राजथः । द्राघिष्ठाभिः । शुचिव्रता । शुचि । व्रता ॥६६४॥

Samveda - Mantra Number : 664
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(उदशंसा) बहुत प्रशंसनीय, (नमोवृधा) नमस्कारों द्वारा बढ़ाने वाले, प्रभु के मित्र और पापनिवारक स्वरूप, (६६३) (दक्षस्य) निज बल की (मह्ना) महिमा से (राजथः) चमक रहे हैं, राज्य कर रहे हैं। ये दोनों स्वरूप, (द्राधिष्ठाभिः) दीर्घकाल लगातार की गई स्तुतियों द्वारा, (शुचिव्रता) हमारे कर्मों और व्रतों को पवित्र कर देते हैं ।
Footnote
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