SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 639

1871 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
अ꣡यु꣢क्त स꣣प्त꣢ शु꣣न्ध्यु꣢वः꣣ सू꣢रो꣣ र꣡थ꣢स्य न꣣꣬प्त्र्यः꣢꣯ । ता꣡भि꣢र्याति꣣ स्व꣡यु꣢क्तिभिः ॥६३९॥

अ꣡यु꣢꣯क्त । स꣣प्त꣢ । शु꣣न्ध्यु꣡वः꣢ । सू꣡रः꣢꣯ । र꣡थ꣢꣯स्य । न꣣प्त्यः꣢꣯ । ता꣡भिः꣢꣯ । या꣣ति । स्व꣡यु꣢꣯क्तिभिः । स्व । यु꣣क्तिभिः ॥६३९॥

Mantra without Swara
अयुक्त सप्त शुन्ध्युवः सूरो रथस्य नप्त्र्यः । ताभिर्याति स्वयुक्तिभिः ॥

अयुक्त । सप्त । शुन्ध्युवः । सूरः । रथस्य । नप्त्यः । ताभिः । याति । स्वयुक्तिभिः । स्व । युक्तिभिः ॥६३९॥

Samveda - Mantra Number : 639
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सूरः) प्रेरक तथा मेधावी परमात्मा ने (सप्त) सात (शुन्ध्युवः) शोधकशक्तियों को (अयुक्त) शरीर में नियुक्त किया है, जो कि (रथस्य) रमणीय-शरीर को (नप्त्रय) पाप कर्मों में पतित होने से बचाती है। (स्वयुक्तिभिः) स्वयं नियुक्त की हुई (ताभिः) उन सात शक्तियों के साथ, समन्वय में, परमेश्वर, शरीर में (याति) विचरता है ।
Footnote
[ सप्त शुन्ध्युवः = ५ ज्ञानेन्द्रियां, १ मन, १ बुद्धि । ये सात शक्तियाँ परमात्मा ने शरीर में दी हैं जो कि सर्वोत्कृष्ट हैं । जब ये शक्तियाँ उपासना आदि साधनों द्वारा शुद्ध हो जाती हैं तब ये शरीर को पाप-कर्मों में पतित नहीं होने देतीं। मानो परमेश्वर तब इन शक्तियों के साथ समन्वय में होकर शरीर का शासन करता है ]