SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 638

1871 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
उ꣡द्द्यामे꣢꣯षि꣣ र꣡जः꣢ पृ꣣थ्व꣢हा꣣ मि꣡मा꣢नो अ꣣क्तु꣡भिः꣢ । प꣢श्य꣣ञ्ज꣡न्मा꣢नि सूर्य ॥६३८॥

उ꣢त् । द्याम् । ए꣣षि । र꣡जः꣢꣯ । पृ꣣थु꣢ । अ꣡हा꣢꣯ । अ । हा꣣ । मि꣡मा꣢꣯नः । अ꣣क्तु꣡भिः꣢ । प꣡श्य꣢꣯न् । ज꣡न्मा꣢꣯नि । सू꣣र्य ॥६३८॥

Mantra without Swara
उद्द्यामेषि रजः पृथ्वहा मिमानो अक्तुभिः । पश्यञ्जन्मानि सूर्य ॥

उत् । द्याम् । एषि । रजः । पृथु । अहा । अ । हा । मिमानः । अक्तुभिः । पश्यन् । जन्मानि । सूर्य ॥६३८॥

Samveda - Mantra Number : 638
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(पावक) हे पवित्र करने वाले ! (वरुण) तथा हे पापों से निवारण करने वाले वरणीय प्रभो ! (त्वम्) आाप (येन चक्षसा) जिस कृपा दृष्टि से (जनान् अनु) जन समुदाय के (भुरण्यन्तम्) भरण-पोषण करने वाले परोपकारी व्यक्ति को (पश्यसि) देखते है—
उसी कृपा दृष्टि से (सूर्य) हे सूर्यों-के-सूर्य ! आप (जन्मानि) जन्म-मरण व्यवस्था में बंधे समग्र प्राणियों को (पश्यन्) देख रहे हैं । और उसी कृपा दृष्टि से आप (द्याम्) द्युलोक, (रजः) अन्तरिक्ष लोक, और (पृथु) विस्तृत पृथिवीलोक के प्रति (उद् एषि) उदित हो रहे हैं, और (अक्तुभिः) रात्रियों समेत (अहा) दिनों का (मिमानः) निर्माण कर रहे हैं ।
Footnote
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