SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 637

1871 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
ये꣡ना꣢ पावक꣣ च꣡क्ष꣢सा भु꣣रण्य꣢न्तं꣣ ज꣢ना꣣ꣳ अ꣡नु꣢ । त्वं꣡ व꣢रुण꣣ प꣡श्य꣢सि ॥६३७॥

ये꣡न꣢꣯ । पा꣣वक । च꣡क्ष꣢꣯सा । भु꣣रण्य꣡न्त꣢म् । ज꣡ना꣢꣯न् । अ꣡नु꣢꣯ । त्वम् । व꣣रुण । प꣡श्य꣢꣯सि ॥६३७॥

Mantra without Swara
येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाꣳ अनु । त्वं वरुण पश्यसि ॥

येन । पावक । चक्षसा । भुरण्यन्तम् । जनान् । अनु । त्वम् । वरुण । पश्यसि ॥६३७॥

Samveda - Mantra Number : 637
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(पावक) सब के शोधक ! (वरुण) वरणीय वा अनिष्ट के रोकने वाले ! सूर्य ! वा परमात्मन् ! (जनान्) प्राणियों का (भुरण्यन्तम्) धारण का पोषण करते हुए इस लोकत्रय को (येन) जिस (चक्षसा) प्रकाश से (अनु) क्रमपूर्वक (पश्यसि) आप प्रकाशित करते वा देखते हैं [ उस प्रकाश की हम प्रशंसा करते हैं ] यह अध्यहारवाक्य जानिये । यद्वा—अगली ऋचा में “उदेषि” क्रिया से अन्वय करके [ उस प्रकाश से आप उदय को प्राप्त होते हैं ] यह अर्थ जानिये ॥
Footnote
यास्क मुनि ने निरुक्त में इस मन्त्र के अगले पीछले दोनों मन्त्रों को मिला कर तीनों की व्याख्या जो कुछ की है वह निरुक्त अ० १२ के २२। २३। २४। २५ खण्डों के प्रमाण संस्कृतभाष्य में संपूर्ण उद्धृत हैं, वहीं देखिये यजु० ३३ । ३२ और ऋ० १। ५० में भी ॥