SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 633

1871 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
अ꣢प꣣ त्ये꣢ ता꣣य꣡वो꣢ यथा꣣ न꣡क्ष꣢त्रा यन्त्य꣣क्तु꣡भिः꣢ । सू꣡रा꣢य वि꣣श्व꣡च꣢क्षसे ॥६३३॥

अ꣡प꣢꣯ । त्ये । ता꣣य꣡वः꣢ । य꣣था । न꣡क्ष꣢꣯त्रा । य꣣न्ति । अक्तु꣡भिः꣢ । सू꣡रा꣢꣯य । वि꣣श्व꣡च꣢क्षसे । वि꣣श्व꣢ । च꣣क्षसे ॥६३३॥

Mantra without Swara
अप त्ये तायवो यथा नक्षत्रा यन्त्यक्तुभिः । सूराय विश्वचक्षसे ॥

अप । त्ये । तायवः । यथा । नक्षत्रा । यन्ति । अक्तुभिः । सूराय । विश्वचक्षसे । विश्व । चक्षसे ॥६३३॥

Samveda - Mantra Number : 633
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(यथा) जैसे (त्ये) वे (तायवः) चोर, सूर्योदय के होते, (अप यन्ति) छिप जाते हैं, वैसे जब (नक्षत्रा) नक्षत्र (अक्तुभिः) रात्रियों समेत (अपयन्ति) छिप जाते हैं, तब से (विश्वचक्षसे) विश्वद्रष्टा (सूराय) सूर्यों-के-सूर्य के लिए, दिन के ३० मुहूर्तों में, उपासक में स्तुति-वाणी विराजमान रहती हैं (मन्त्र ६३२ के साथ अन्वय)
Footnote
[ अभिप्राय यह है कि दिन में चित्तवृत्तियों के व्युत्थान के कारणों के रहते भी सच्चे उपासक की चित्तवृत्तियों में, परमात्मा की स्तुति ही विराजमान रहती है ]