SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 595

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्ष आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
त्व꣢मे꣣त꣡द꣢धारयः कृ꣣ष्णा꣢सु꣣ रो꣡हि꣢णीषु च । प꣡रु꣢ष्णीषु꣣ रु꣢श꣣त्प꣡यः꣢ ॥५९५॥

त्व꣢म् । ए꣣त꣢त् । अ꣣धारयः । कृष्णा꣡सु꣢ । रो꣡हि꣢꣯णीषु । च꣣ । प꣡रु꣢꣯ष्णीषु । रु꣡श꣢꣯त् । प꣡यः꣢꣯ ॥५९५॥

Mantra without Swara
त्वमेतदधारयः कृष्णासु रोहिणीषु च । परुष्णीषु रुशत्पयः ॥

त्वम् । एतत् । अधारयः । कृष्णासु । रोहिणीषु । च । परुष्णीषु । रुशत् । पयः ॥५९५॥

Samveda - Mantra Number : 595
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमात्मन् ! आपने (कृष्णासु) तामसिक, (च रोहिणीषु) और राजसिक, तथा (परुष्णीषु) सात्त्विक चित्तवृत्तियों में, (रुशत्) चमकीला (पयः) ज्ञानदुग्ध (अधारयः) स्थापित किया है ।
Footnote
[ तीनों प्रकार की चित्तवृत्तियों में सत्वगुण निहित रहता है। इसी सत्त्वगुण की न्यूनता और अधिकता में ज्ञान की न्यूनता और अधिकता होती है । सत्त्वगुण प्रकाशमय है । “रुशत्पयः” अर्थात् चमकीला ज्ञानदुग्ध सत्त्वगुण का परिणामरूप है । योगाभ्यास में तामसिक और राजसिक वृत्तियों का निरोध कर सात्त्विक चित्त-वृत्तियों को जगाना होता है । अन्त में इन सात्त्विक वृत्तियों का भी निरोध करके कैवल्यावस्था और मोक्ष पाना होता है । परमात्मा ने सब के चित्तों में इस सत्त्वगुण की स्थापना कर रखी है । इस सत्त्वगुण की अधिक जागृति मनुष्य के अभ्यास और वैराग्य पर निर्भर करती है ] परुष्णी का अर्थ “भास्वती” भी है, अर्थात् चमकीली (निरु० ९। ३। २५) ।
परु = पृ (पालने) + ष्णा (शौचे) अर्थात् वह सात्त्विक वृत्ति जो कि योगी की पालना करती है, और अत्यन्त शुचि है, चमकीली है, प्रज्ञावती है । उपनिषद् में तमोगुण को कृष्ण, रजोगुण को लोहित, तथा सत्त्वगुण को शुक्ल कहा है । यथा:—अजामेकां लोहित-शुक्ल-कृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः (श्वेता० ४। ५) । रोहिणी = लोहिनी = लोहित । परुष्णी = शुक्ल, भास्वतीवृत्ति ]